देहरादून। उत्तराखंड में रियल एस्टेट घोटालों की कहानियां अब कोई नई बात नहीं रही, लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा ही दिलचस्प हो गया है। रुड़की के राजपुताना स्थित ग्राम बड़ेई की विवादित भूमि पर एक नया नाटक मंचित हो रहा है। कैलिक्स एडवांस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने उत्तराखंड रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण को पत्र भेजकर इस विवादित भूमि पर किसी भी नई परियोजना के पंजीकरण को रोकने की मांग की है।

करोड़ रूपए लेकिन काम नहीं किया

यह कहानी 2013 से शुरू होती है, जब कैलिक्स एडवांस रियल एस्टेट ने गीता डेवलपर्स नामक फर्म के साथ एक सहयोग सह विकास समझौता (JDA) किया। मजेदार बात यह है कि इस फर्म के मालिक ललित मोहन अग्रवाल हैं, जो संयोगवश भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी रुड़की की मेयर अनीता अग्रवाल के पति भी हैं। समझौते के तहत करीब 62 कच्ची बीघा कृषि भूमि का विकास किया जाना था। कैलिक्स एडवांस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड ने गीता डेवलपर्स को 2.09 करोड़ रुपये भी दे दिए ताकि वह भूमि को कृषि से वाणिज्यिक/आवासीय में परिवर्तित कर सके। मगर गीता डेवलपर्स ने 11 साल तक आराम से बैठकर इस पर कोई काम नहीं किया। लगता है, सत्ता के सुख में व्यस्त होने से जमीन के रूपांतरण का समय ही नहीं मिल पाया।

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जानें कौन है ललित मोहन अग्रवाल

अब जरा इन ललित मोहन अग्रवाल के बारे में भी जान लीजिए। क्षेत्रीय पोर्टल “रुड़की हब” के अनुसार, 2018 से राजनीति में सक्रिय हुए ललित मोहन अग्रवाल के बारे में आम जनता का सवाल यही है – “ये साहब आखिर हैं कौन?” उनके नाम के साथ ‘समाजसेवी’ का टैग तो चिपका हुआ है, मगर उनकी समाजसेवा के ठोस सबूत ढूंढने पर भी शायद ही मिलें। इतने सालों बाद जब कैलिक्स एडवांस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड ने मौके का निरीक्षण किया, तो उनके होश उड़ गए। वहां तो श्री मनोज और श्री पंकज नामक कुछ ‘खास’ लोग अनधिकृत निर्माण में जुटे थे। और तो और, बिना किसी आधिकारिक अनुमति के भूमि के सामने से टाटा मोटर्स को 12 फुट चौड़ा रास्ता भी दे दिया गया। अब बताइए, यह विकास हो रहा है या निजी हित साधे जा रहे हैं?

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गीता डेवलपर्स ने हड़पे 2.09 करोड़

कैलिक्स एडवांस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड का आरोप है कि गीता डेवलपर्स ने न केवल अनुबंध का उल्लंघन किया बल्कि 2.09 करोड़ रुपये भी हड़प लिए। 11 वर्षों में न तो ज़मीन का रूपांतरण हुआ और न ही पैसे लौटाए गए। कानूनी नोटिस भेजे गए, बार-बार अनुरोध किए गए, लेकिन गीता डेवलपर्स तो कान में रुई ठूंसकर बैठा रहा।

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अब प्राधिकरण से गुजारिश की गई है कि इस विवादित भूमि पर किसी भी नई रियल एस्टेट परियोजना को पंजीकृत न किया जाए। कारण साफ है – अगर ऐसा हुआ तो निर्दोष खरीदारों को कानूनी दांव-पेंच और वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ेगा। वैसे, हमारी महान रियल एस्टेट प्रणाली में पहले भी ऐसा हो चुका है, लेकिन इस बार मामला और दिलचस्प है। देखना यह होगा कि प्राधिकरण इस पर क्या कार्रवाई करता है – निष्पक्ष न्याय या फिर ‘विशेष शक्तियों’ के आगे घुटने टेकना?