पूर्व रेल मंत्री और TMC नेता मुकुल रॉय का देर रात 1:30 बजे कोलकाता के साल्ट लेक के अपोलो हॉस्पिटल में निधन हो गया. उनके बेटे सुभ्रांशु रॉय ने इसकी पुष्टि की है. बताया जा रहा है कि कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हुआ है. शुभ्रांशु रॉय का कहना है कि उनके पिता कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे थे. हाल ही में उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई थी. इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां रविवार देर रात इलाज के दौरान उनका निधन हो गया.
मुकुल रॉय ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बंगाल में यूथ कांग्रेस से की थी. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल रॉय लंबे समय तक मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे.
मुकुल रॉय साल 2024 से डिमेंशिया समेत कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे। बीते कुछ दिनों से वो कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती थे। देर रात 1:30 बजे दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। मुकुल रॉय को ममता बनर्जी के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में दूसरे प्रभावशाली नेता के रूप में जाना जाता था।
मुकुल रॉय ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बंगाल में यूथ कांग्रेस से की थी. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल रॉय लंबे समय तक मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे. हालांकि, रॉय ने नवंबर 2017 में टीएमसी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन कर ली थी.
2017 में भारतीय जनता पार्टी जॉइन करने के बाद मुकुल रॉय ने टीएमसी को अपने कद का अहसास कराया. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने बंगाल में 18 लोकसभा सीटें जीतीं, इसके पीछे सबसे बड़ा रोल रॉय का था. माना जाता है कि रॉय ने टीएमसी के कोर वोटरों में सेंध लगाई थी. वह साल 2021 में कृष्णनगर उत्तर सीट से भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे थे और विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी.
इसी बीच मुकुल रॉय जून 2021 में उन्होंने बीजेपी को अलविदा कहा और TMC में लौट गए थे. 13 नवंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने दल बदल विरोधी कानून के तहत रॉय को अयोग्य विधायक घोषित कर दिया था. इस दौरान मुकुल स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से घिर गए. वह बीमार रहने लगे और उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली.
यूपीए-2 सरकार के दौरान उन्होंने पहले जहाजरानी राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली और बाद में मार्च 2012 में रेल मंत्री बने. बंगाल की राजनीति में रणनीतिक कौशल के कारण मुकुल रॉय कोकभी-कभी ‘चाणक्य’ की उपाधि भी दी जाती थी.
मुकुल रॉय ने जनवरी 1998 में टीएमसी पार्टी की स्थापना के बाद ममता बनर्जी के साथ मिलकर संगठन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई. जब ममता ने पार्टी का गठन किया तो रॉय को महासचिव का पद दिया. साथ ही रॉय को दिल्ली में पार्टी का चेहरा बनाकर भेजा.
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