Soap History: जब नहीं था साबुन तब कैसे नहाते थे भारत के लोग, जानें कहानी
Soap History: जब नहीं था साबुन तब कैसे नहाते थे भारत के लोग, जानें कहानी
भारत में आधुनिक साबुन का इतिहास 130 साल पुराना है.
भारत में आधुनिक साबुन का इतिहास 130 साल पुराना है.
लेकिन जब साबुन नहीं था तब भारत के लोग कैसे नहाते थे? आइए जानते हैं
लेकिन जब साबुन नहीं था तब भारत के लोग कैसे नहाते थे? आइए जानते हैं
रीठा यानी कि सोप नट प्राचीन भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक क्लींजर में से एक था.
रीठा यानी कि सोप नट प्राचीन भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक क्लींजर में से एक था.
जब इसे पानी में भिगोया या फिर उबाला जाता था तो यह साबुन जैसा ही प्राकृतिक झाग बनाता था.
जब इसे पानी में भिगोया या फिर उबाला जाता था तो यह साबुन जैसा ही प्राकृतिक झाग बनाता था.
इससे यह बिना किसी तेज केमिकल के त्वचा और बालों को साफ करने के लिए सही था.
इससे यह बिना किसी तेज केमिकल के त्वचा और बालों को साफ करने के लिए सही था.
शिकाकाई जिसे अक्सर बालों का फल भी कहा जाता है, बालों को साफ करने के पारंपरिक तरीकों का एक बड़ा हिस्सा था.
शिकाकाई जिसे अक्सर बालों का फल भी कहा जाता है, बालों को साफ करने के पारंपरिक तरीकों का एक बड़ा हिस्सा था.
शिकाकाई जिसे अक्सर बालों का फल भी कहा जाता है, बालों को साफ करने के पारंपरिक तरीकों का एक बड़ा हिस्सा था.
शिकाकाई जिसे अक्सर बालों का फल भी कहा जाता है, बालों को साफ करने के पारंपरिक तरीकों का एक बड़ा हिस्सा था.
मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल तेल सोखने और त्वचा को शुद्ध करने के लिए किया जाता था. गांव में लकड़ी की राख को भी इस्तेमाल किया जाता था.
मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल तेल सोखने और त्वचा को शुद्ध करने के लिए किया जाता था. गांव में लकड़ी की राख को भी इस्तेमाल किया जाता था.
एक लोकप्रिय पारंपरिक तरीका यह था कि शरीर की तेल से मालिश की जाती थी.
एक लोकप्रिय पारंपरिक तरीका यह था कि शरीर की तेल से मालिश की जाती थी.
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