पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर सियासी और संवैधानिक विवाद गहराता जा रहा है. सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनाव आयोग से इस प्रक्रिया पर साफ दिशा निर्देश जारी करने की मांग की है. TMC का आरोप है कि 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने योग्य और वास्तविक मतदाताओं के लिए भ्रम और समस्याएं पैदा कर दी हैं. TMC का कहना है कि SIR की वर्तमान प्रक्रिया मतदाताओं के मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर रही है और लोकतंत्र की मूल संरचना को नुकसान पहुंचा सकती है. इसी कारण से TMC ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है. ममता बनर्जी ने साफ कहा है कि जरूरत पड़ी तो वे खुद जनता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में बहस करेंगी.

ममता ने यह भी कहा कि इतने संवैधानिक महत्व के कार्य के लिए कोई ठोस लिखित अधिसूचना या वैधानिक आदेश जारी नहीं किए गए हैं. निर्देश अक्सर अनौपचारिक माध्यमों से दिये जा रहे हैं, जिससे आम जनता में डर और तनाव बढ़ रहा है. उन्होंने यह भी बताया कि यह दबाव कुछ लोगों को आत्महत्या जैसे दुखद कदम तक ले जा रहा है.

उन्होंने तीन महीने के भीतर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तीन पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया में खामियों और असमानताओं की ओर ध्यान दिलाया था. लेकिन संतोषजनक जवाब न मिलने पर अब पार्टी ने कानूनी उपाय अपनाया है. पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर सत्तारूढ़ TMC और चुनाव आयोग के बीच विवाद गहराता जा रहा है. TMC ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर चुनाव आयोग से स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे हैं, क्योंकि 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट सूची ने मतदाताओं में भ्रम और समस्याएं बढ़ाई हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं.

एक कार्यक्रम के दौरान ममता बनर्जी ने साफ़ तौर से आरोप लगाया कि चुनाव आयोग व्हाट्सएप संदेशों के आधार पर निर्णय ले रहा है. उन्होंने कहा कि उन्हें यह भी पता नहीं कि अधिकारियों को कोई खरीद फरोख्त के जरिए प्रभावित किया गया है या नहीं, लेकिन इस तरह का मनमाना रवैया लोकतंत्र के लिए खतरनाक है. अपने तीसरे पत्र में उन्होंने चुनाव आयोग की उस समयसीमा पर भी सवाल उठाए, जो SIR को लागू करने के लिए दी गई है. उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में विभिन्न मानदंड और समय सीमा तय करना संवैधानिक समानता के सिद्धांत के खिलाफ है. चुनाव आयोग के निर्देशों में लगातार बदलाव ने इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया है.

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