ढाका। बांग्लादेश में स्टूडेंट्स की अगुवाई में हुए खूनी बगावत ने सालभर पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया था, अब उनकी दुश्मन खालिदा ज़िया की तेज़ी से बिगड़ती सेहत का मतलब है कि देश अपने दो मुख्य पॉलिटिकल चेहरों के बिना है, ऐसे समय में जब अंतरिम सरकार अप्रैल तक चुनाव का वादा कर रही है.

दो बार की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की चेयरपर्सन बेगम खालिदा ज़िया एक गंभीर हेल्थ क्राइसिस से जूझ रही हैं. रविवार, 30 नवंबर को रॉयटर्स ने बताया कि ज़िया की हालत ढाका के एक हॉस्पिटल में “बहुत क्रिटिकल” बनी हुई है. डॉक्टरों और पार्टी के सीनियर अधिकारियों ने कहा कि उन्हें 23 नवंबर को “सीने में गंभीर इन्फेक्शन के कारण भर्ती कराया गया था, जिससे उनके दिल और फेफड़े प्रभावित हो रहे थे”. वह 80 साल की हैं.

क्या लौटेगा खालिदा ज़िया का बेटा?

अगस्त 2024 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद ज़िया को हाउस अरेस्ट से रिहा कर दिया गया था. इलाज के लिए विदेश यात्रा करने के बाद, वह इस साल मई में ढाका लौटीं, जहाँ हज़ारों पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया. हालाँकि, तब से उनकी सेहत तेज़ी से बिगड़ गई है. इससे BNP पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ा है, जो पारंपरिक रूप से शेख हसीना की अब बैन हो चुकी अवामी लीग का ज़्यादा दक्षिणपंथी विकल्प रही है.

BNP ने पिछले दो चुनावों का बॉयकॉट किया था, फिर भी शेख हसीना के हटने के बाद से उसे सबसे आगे देखा जा रहा है. लेकिन इसकी मुखिया अब बहुत बीमार हैं और उनके बेटे और घोषित उत्तराधिकारी, तारिक रहमान, अभी भी विदेश में हैं. BNP के एक्टिंग चेयरमैन 2008 से लंदन में रह रहे तारिक रहमान ने फेसबुक पर कहा कि बांग्लादेश लौटना “पूरी तरह से” उनके कंट्रोल में नहीं है.

कुछ घंटों बाद, नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी वापसी पर “कोई रोक या आपत्ति” नहीं है. यूनुस के प्रेस सेक्रेटरी ने कहा, “इस मामले में कोई रुकावट नहीं है.”

बांग्लादेश में अब चुनाव कब हैं?

दोनों बड़े लोगों के किनारे होने के बाद, बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस का अंतरिम प्रशासन चल रहा है, जिन्होंने कहा है कि चुनाव अप्रैल 2026 में हो सकते हैं. BNP ने इस दिसंबर या अगले साल फरवरी में चुनाव कराने की मांग की है. न्यूज़ एजेंसी AP ने बताया है कि अभी तक चुनाव के टाइमटेबल और प्रोसेस पर कोई आम सहमति नहीं बन पाई है.

इस बीच नई पॉलिटिकल ताकतें उभर रही हैं. बगावत को लीड करने वाले स्टूडेंट लीडर्स ने एक नई पार्टी बनाई है और मांग कर रहे हैं कि संविधान को फिर से लिखा जाए. धार्मिक कट्टरपंथी भी असर डाल रहे हैं. देश की सबसे बड़ी इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी ने इस साल की शुरुआत में अहम स्टूडेंट चुनाव जीता था. इसने ढाका में बड़ी रैलियां की हैं.