दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने देश में कानून, नैतिकता और विज्ञान के बीच नई बहस छेड़ दी है. क्या माता-पिता अपने मृत, अविवाहित बेटे के फ्रीज किए गए स्पर्म के कानूनी हकदार हो सकते हैं? क्या बिना लिखित सहमति के किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके जैविक सैंपल का इस्तेमाल संतान उत्पत्ति के लिए किया जा सकता है? इन्हीं सवालों के बीच केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट के जज के आदेश को चुनौती दे दी है और मामला अब एक नई कानूनी कसौटी पर खड़ा है.
क्या माता-पिता अपने मृत अविवाहित बेटे के फ्रीज किए गए स्पर्म पर अधिकार जता सकते हैं? दिल्ली हाईकोर्ट के 2024 के फैसले को स्वास्थ्य मंत्रालय ने चुनौती दी है. मंत्रालय का कहना है कि बिना लिखित सहमति पोस्टह्यूमस रिप्रोडक्शन कानून के खिलाफ है और इससे बच्चे की कानूनी पहचान पर संकट खड़ा होगा. पोस्टह्यूमस रिप्रोडक्शन का मतलब है किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद ART तकनीक से संतान उत्पन्न करना.
यह मामला सिर्फ एक परिवार की भावनाओं तक सीमित नहीं है. यह देश की असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी व्यवस्था, उत्तराधिकार कानून और बच्चे के कानूनी भविष्य से जुड़ा है.
मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सर गंगाराम अस्पताल को निर्देश दिया था कि वह एक मृत अविवाहित व्यक्ति का फ्रीज किया गया स्पर्म उसके माता-पिता को सौंप दे. कोर्ट ने कहा था कि अगर सहमति साबित की जा सके, तो पोस्टह्यूमस रिप्रोडक्शन पर कोई कानूनी रोक नहीं है. लेकिन अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने उसी फैसले को कानून के दायरे से बाहर बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी है.
एक युवक ने 2020 में कैंसर के इलाज से पहले अपनी फर्टिलिटी सुरक्षित रखने के लिए अपना स्पर्म फ्रीज कराया था. इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हो गई. वह अविवाहित था और उसने स्पर्म के भविष्य के इस्तेमाल को लेकर कोई लिखित सहमति नहीं दी थी. उसकी मौत के बाद माता-पिता ने सरोगेसी के जरिए संतान के लिए स्पर्म मांगा. हाईकोर्ट ने अनुमति दी लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस फैसले को चुनौती दे दी.
मंत्रालय का कहना है कि अदालत ने कानून की परिभाषाओं को दोबारा लिख दिया है. सरकार के अनुसार, कोर्ट ने ‘इंटेंडिंग ग्रैंडपैरेंट्स’ नाम की नई श्रेणी बना दी, जो ART और सरोगेसी कानूनों में मौजूद ही नहीं है. मंत्रालय का तर्क है कि फ्रीज किया गया स्पर्म कोई संपत्ति नहीं है, जिसे उत्तराधिकार में बांटा जा सके.
सरकार ने कहा कि अगर दादा-दादी की पहल पर बच्चे का जन्म होता है तो उस बच्चे की कानूनी माता-पिता पहचान ही तय नहीं हो पाएगी. यह ART और सरोगेसी कानूनों के मूल उद्देश्य के खिलाफ है, जिनका मकसद बच्चे के अधिकार, सुरक्षा और स्पष्ट पैरेंटेज सुनिश्चित करना है.
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