शिक्षा में संरचनात्मक सुधार किये बिना नई शिक्षा नीति का अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा, छग प्रदेश शिक्षक फेडरेशन ने दिया तर्क

सत्या राजपूत  रायपुर। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति तभी पूरी तरह से सफल होगी जब शिक्षक इसे अपने मन की बात समझकर क्रियान्वित करेंगे. बंद एसी कमरों में नीतियां तैयार तो किया जा सकती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग होता है. शिक्षा में संरचनात्मक सुधार किये बिना शिक्षा नीति बनाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा. यह बात छत्तीसगढ़ प्रदेश शिक्षक फेडरेशन के प्रांताध्यक्ष राजेश चटर्जी ने कही.

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फेडरेशन के अनुसार, प्राथमिक में 1 से 5 तक 5 कक्षा 4 विषय, पूर्व माध्यमिक में 6 से 8 तक तीन कक्षा और 6 विषय एवं उच्चतर माध्यमिक में 9 से 12 तक 4 कक्षा 6/5 विषय हैं. कक्षाओं की संख्या और विषयों की संख्या के अनुपात में शिक्षक होना था,जबकि नई शिक्षा नीति में अनुपात 25:1 अर्थात 25 विद्यार्थियों पर 1 शिक्षक होने का उल्लेख है, जो कि अव्यवहारिक है.

राजेश चटर्जी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में बेसिक साक्षरता और बेसिक न्यूमरेसी पर भी फोकस किया गया है. इसके तहत पाठ्यक्रम के शैक्षणिक ढांचे में संकाय का कोई अलगाव न रखते हुए बड़ा बदलाव किया गया है. नीति में इस बात पर जोर दिया गया है कि कम से कम कक्षा 5 तक सिखाने का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा हो, लेकिन कक्षा 8 तक या उसके बाद यह प्राथमिकता के आधार पर होगा. इसके कारण भविष्य में उच्च शिक्षा एवं एमएनसी में रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं.

उन्होंने कहा कि सभी स्कूली स्तरों और उच्च शिक्षा स्तर पर संस्कृत को 3 लैंग्वेज फॉर्मूला के साथ विकल्प के रूप में पेश किया गया है. नई शिक्षा नीति के तहत बोर्ड परीक्षाएं लो स्टेक वाली होंगी और छात्र के वास्तविक ज्ञान का आकलन करने वाली होंगी. इसका अर्थ है कि रिपोर्ट कार्ड प्रतिभा एवं क्षमता की विस्तृत रिपोर्ट देने वाले होंगे, केवल नंबर बताने वाले नहीं होंगे.

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