विशेष : कहानी उस ऐतिहासिक पहाड़ की, जिसे सरकार ही बर्बाद करने पर तुली है, कहानी उस तलाब की जहाँ सोनाई-रोपाई की आत्माएँ बसती हैं!

वैभव बेमेतरिहा/ सुशील सलाम, कांकेर।  आज विश्व पर्यावरण दिवस है. इस दिन पर्यावरण से जुड़ी एक ऐसी खबर जिसे आपको जानना भी चाहिए और हो क्या रहा उसे पढ़ना भी. रिपोर्ट उत्तर बस्तर में कांकेर के उस पहाड़ की जो सैकड़ों वर्षों से बस्तर के रास्ते पर स्वागत द्वार है. लेकिन आज इस पहाड़ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. एक ऐसा खतरा जो उसके अस्तिव को मिटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. कहानी कांकेर में ऐतिहासिक ‘गढ़िया पहाड़’ की. इस पहाड़ में पर्यटन के नाम पर सरकार की ओर जो विकास किया जा रहा है वही बर्बादी का कारण बन चुका है. पहाड़ पर इतने चोट किए गए हैं कि पहाड़ की हरियाली उजड़ रही है. वन विभाग और लोक निर्माण विभाग ने नियम विरुद जाकर इतने काम इस पहाड़ पर करा दिए जिससे पहाड़ को बना नुकसान हुआ है. जमीन से ऊपर पहाड़ की चोटी पर एक चौड़ी सकड़ निर्माण के नाम पर पहाड़ को तबाह कर दिया गया है. उस पहाड़ को जो राजा धर्मदेव के जमाने की पुरानी यादें और इतिहास को संजोए हुए है.

सच्चाई यही है कि कांकेर की पहचान गढ़िया पहाड़ अपनी पहचान और ऐतिहासिक महत्व खोता जा रहा है. गढ़िया पहाड़ के नीचे मैदान पर आज भी मेला लगता है, लेकिन इस मेले के प्रति लोगों का आकर्षण अब खत्म होता जा रहा है. गढ़िया पहाड़ पर प्राचीन सोनई-रूपई तालाब जो दशकों तक दूसरों की प्यास बुझाता था वह आज देखरेख के अभाव में सूखने और पटने की स्थिति में है.

पहले बात गढ़िया पहाड़ में पर्यटन के नाम किए गए नुकसान की.  दरअसल साल 2013 में लोक निर्माण विभाग ने बिना पर्यावरण स्वीकृति मिले कार्य स्वीकृति कर कार्य पूर्ण होने की समय-सीमा तय कर दी थी. इधर बिना वन विभाग की अनुमति मिले ही फिरोज कन्ट्रक्शन ने काम शुरू कर दिया था. इसकी जानकारी वन विभाग को मिली तो वन विभाग निर्माण कार्य पर रोक लगा दी. लिहाजा 2015 तक कार्य रुका रहा. नतीजा ये हुआ कि जो समय-अविधि 24.03.15 में कार्य पूर्ण होने की रखी गई थी, उस समय-अविधि के साथ कार्य शुरू हुआ और लागत सीधे दो गुना बढ़ गया. मतलब जो कार्य 6 करोड़ 52 लाख पूरा होने वाला था वह 14 करोड़ 50 लाख की राशि तक पहुँच गया.

इन महत्वपूर्ण बिंदु के साथ यह भी जानिए कि कब-कब, किस रूप में किस तरह निर्माण के दौरान नियम और शर्तों का खुला उल्लंघन और जमकर मनमानी हुई है-

1. वैकल्पिक वृक्षारोपण हेतु राज्य की वनभूमि 50 प्रतिशत से ज्यादा होनी चाहिए, लेकिन कांकेर जिले की वनभूमि 52.20 प्रतिशत का स्वीकृत ली गई. जबकि राज्य में वनभूमि 43.94 प्रतिशत है.
2. सगौन की लकड़ी की तस्करी की संभावना- सड़क निर्माण में जिला प्रशासन की ओर से 144 पेड़ काटने की बात कही गई, जबकि वन विभाग ने 97 पेड़ काटने की जानकारी दी.
3. गढ़िया पहाड़ को पर्यटन स्थल बताकर पहाड़ पर सड़क निर्माण किया जा रहा, जबकि पर्यटन विभाग की सूची में गढ़िया पहाड़ शामिल ही नहीं है.
4. लोक निर्माण विभाग ने बिना पर्यावरण स्वीकृति मिले ही पहाड़ पर ठेकेदार को काम करने की अनुमति दे दी थी, जबकि वन विभाग से अनुमति निर्माण शुरू होने के डेढ़ साल बाद मिली. 
5. निर्माण के दौरान सर्वे से लेकर कई प्रकियाओं का सही तरीके से लोक निर्माण विभाग ने पालन नहीं किया, नतीजा दो बार समय अवधि के साथ लागत राशि बढ़ी और 6.50 करोड़ में बनने वाली सड़क अब 14.50 करोड़ में बन रही है.
6. वन विभाग से बिना अनुमति लिए गए ही पहाड़ पर ब्लॉस्टिंग किया गया, जबकि वन विभाग ने ब्लॉस्टिंग करने पर पहाड़ को नुकसान होने की बात कही थी. 
7. विधानसभा में मंत्री लोक निर्माण विभाग की तरफ से गलत जवाब दिया गया- विधायक देवती कर्मा 25.07.14 को प्रश्न क्रमांक 934 और नेता-प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव 22.12.14 ने प्रश्न क्रमांक 302 और विधायक मोहन मरकाम 18.03.15 में प्रश्न क्रमांक 1006 की ओर से पूछे गए प्रश्न में कार्य प्रारंभ नहीं होना बताया गया था. इसके साथ ही नेता-प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव की ओर से प्रश्न क्रमांक 2593 दिनांक 07.03.2017 में पूछे गए सवाल पर जवाब दिया गया कि 06.04.2015 से ठेकेदार द्वार निर्माण कार्य शुरू करना बताया गया. जबकि 2013 में निर्माण शुरू हो गया था बाद में वन विभाग ने रोक दिया था. 
दरअसल लोक निर्माण विभाग को पहाड़ पर सड़क निर्माण की अनुमति इस शर्त पर मिली थी कि राजस्व भूमि को वन भूमि बनाकर वहाँ जितने पेड़ कटे हैं उससे ज्यादा दोगुने पेड़ लगाना होगा. लेकिन पेड़ तो लगे नहीं, लेकिन वृक्षारोपण के नाम पर 50 लाख जरूर अधिकारी हजम कर गए. गढ़िया पहाड़ की वर्तमान स्थिति क्या है यह वहाँ जाकर देखा ही जा सकता है.  वैसे पहाड़ को नुकसान पहुँचाने हुए भ्रष्टाचार की लिस्ट लंबी है. फिलहाल गढ़िया पहाड़ में है क्या-क्या वो जानिए…और क्यों इसे बचाना जरूरी है वो ?

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                                                                                                        सोनई रुपाई तालाब की कहानी

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गढ़िया पहाड़ पर करीब सात सौ साल पहले धर्मदेव कंड्रा नाम के राजा का किला हुआ करता था राजा ने ही यहाँ पर तालाब बनवाया था. राजा धर्मदेव की सोनई और रुपाई नाम की दो बेटियां थी, वो दोनों इसी तालाब के आसपास खेला करती थी एक दिन दोनों तालाब में डूब गई. तब से यह माना जाता है सोनई-रुपाई की आत्माएँ इस तालाब की रक्षा करती है इसलिए इसका पानी कभी नहीं सूखता. पानी का सोना-चाँदी की तरह चमकना सोनई-रुपाई के यहाँ मौजूद होने की निशानी के रूप में देखा जाता है.

                                                                                                               सिंह द्वार

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कंड्रा राजा धर्मदेव ने गढ़िया पहाड़ को मजबूत किले का रूप दिया था किले का सात सौ साल पुराना सिंहद्वार आज भी कांकेर के अतीत गौरव का साक्षी है. गढ़िया पहाड़ की इतिहास की सच्चाई को बया करता हुआ विशाल पत्थरों से निर्मित द्वार स्थित है. इसे सिंहद्वार के नाम से जाना जाता है | राजापारा की ओर से सीढी मार्ग के द्वारा जाने के रास्ते में यह द्वार पड़ता है.  सिंहद्वार से लगा हुआ किले की चारदीवारी हुआ करती थी अब ओ चारदीवारी ढह गई है .

                                                                                                                   फांसी भाठा


राजशाही के ज़माने में फांसी भाठा में अपराधियों को मृत्यु दण्ड दिया जाता था.  अपराधियों को ऊँचाइयों से नीचे फेंका जाता था. एक बार कैदी ने अपने साथ सिपाही को भी खिंच लिया. इसके बाद से अपराधियों के हाथ बांधकर उन्हें दूर से बांस से धकेला जाने लगा. झंडा शिखर के पास ही फांसी भाठा स्थित है इस स्थान से अपराधियों को राजा के द्वारा सजा ए मौत का फरमान जारी करने के बाद उन्हें पहाड़ी के नीचे धक्का दे दिया जाता था .

                                                                                                                    जोगी गुफा

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मेलाभाठा की ओर से पहाड़ी के ऊपर जाने के मार्ग में एक काफी विशाल गुफा स्थित है. इसे जोगी गुफा कहा जाता है साथ ही कहा जाता है कि उस गुफा में एक सिद्ध जोगी तपस्या किया करते थे जिनका शारीर काफी विशाल था | वहाँ उस जोगी के द्वारा पहने जाने वाला काफी विशाल खडऊ आज भी मौजूद है. इस कारण इस गुफा को जोगी गुफा कहा जाता है | इस गुफा में प्राचीन काल से अब तक अनेक तपस्वी आकर ठहरते थे और बारिश का मौसम गुजरने के बाद आगे बढ़ जाते थे. गुफा को देखने आज भी श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते है |

                                                                                                         महाशिवरात्री पर लगता है मेला

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पहाड़ पर एक शिव मंदिर है जो किला बनने से पहले से यहां मौजूद है. कहा जाता है कि यह एक हजार साल पुराना है, इस मंदिर में शिवलिंग के अलावा सूर्य और अन्य देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं हैं। 1955 से हर साल इस पहाड़ पर महाशिवरात्री का मेला लगता है।

                                                                                                     पहाड़ के ऊपर से शहर का दृश्य

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गढ़िया पहाड़ के ऊपर से देखने पर नीचे बह रही दूध नदी से पहाड़ का दृश्य और ज्यादा सुंदर दिखता है. गढ़िया पहाड़ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है. बारिश में यह और भी खूबसूरत लगता है। क्योंकि पहाड़ से दूध नदी दिखाई पड़ता है. कांकेर के मेलाभाठा से पहाड़ी तक सड़क है. आसानी से किसी भी वाहन के द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है. ऊपर जाने वाले रास्ते से शहर का शानदार दृश्य देखने मिलता हैं.

                                                                                                           होलिका दहन स्थल

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झंडा शिखर के समीप ही होलिका दहन स्थल है. कांकेर का पहला होलिका दहन आज भी यहीं होता है. यहीं से अग्नि ले जाकर कांकेर के मोहल्लों में होलिका दहन किया जाता है.

                                                                                           पहाड़ के ऊपर में विराजित माता की मंदिर

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यहां धार्मिक स्थल के कारण कई लोगों का आना जाना है. यह धार्मिक स्थल शीतला माता मंदिर, कांकेश्वरी देवी मंदिर, गढ़िया देव के विराजित हैं. साथ ही यहां की जोगी गुफा भी देखने लायक हैं. यही कारण है कि छुट्टी के दिनों में यहां बड़ी संख्या में दूर-दूर से लोग मंदिर में विराजित देवी-देवताओं के दर्शन करने भी आते हैं. ऐसे में अति प्राचीन पहाड़ को बचाना राज्य और सरकार की जिम्मेवारी के साथ साथ जवाबदेही भी है. लेकिन आज भी हालात में कोई सुधार नहीं हुआ, तो इसके लिए किसकी जिम्मेदारी बनती है ये बड़ा सवाल है.

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