विनोद दुबे, रायपुर। रेणु जोगी की “अजीत जोगी अनकही कहानी” किताब ने जोगी के जीवन के कई अनकहे पहलुओं को उजागर किया है. किताब में रेणु जोगी ने दावा किया है कि अजीत जोगी 1980 में रायपुर कलेक्टर रहते हुए राजनीति के कद्दावर नेता विद्या चरण शुक्ल पर एक बड़ा अहसान किए थे. लेकिन जब उस एहसान को पूरा करने का वक्त आया तो वीसी मुकर गए. रेणु जोगी ने 1992 की उस घटना का जिक्र किया है जिसमें जोगी ने वीसी को उस एहसान का कर्ज चुकाने के लिए कहा था.

वाक्या उस दौरान का था जब 1992 में अजीत जोगी राज्य सभा से सांसद थे और उनका कार्यकाल समाप्त होने ही वाला था. अविभाजित मध्यप्रदेश से कांग्रेस को 1 ही सीट मिलने वाली थी. सीट एक होने की वजह से कई बड़े-बड़े नेता उसके दावेदार थे. शुक्ल बंधु विद्याचरण और श्यामाचरण अजीत जोगी को टिकट देने के पक्ष में नहीं थे. और स्पष्ट तौर पर उसका विरोध कर रहे थे वहीं मोतीलाल वोरा भी अन्दर ही अन्दर जोगी का विरोध कर रहे थे. केवल अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ही जोगी के पक्ष में थे. नरसिम्हा राव उस दौरान देश के प्रधानमंत्री थे और सुंदरलाल पटवा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे. राव को ही फैसला करना था कि टिकट किसे मिलेगी. जोगी चाहते थे कि वो सीट उन्हें मिल जाए. जिसके लिए वे प्रधानमंत्री नरिसम्हा राव से मिलने गए थे. पीएम से मिलने वे उनके निजी सहायक खाण्डेकर के कमरे में बैठे थे वहां पहले से ही शुक्ल बंधु विद्याचरण शुक्ल और श्यामा चरण शुक्ल मौजूद थे. पीएम ने इंतजार कर रहे तीनों नेताओं में से किसी को भी अंदर नहीं बुलाया. देर रात होने पर उनके निजी सहायक खाण्डेकर ने बताया कि नरसिम्हा राव सोने के लिए चले गए हैं.

रेणु ने लिखा है कि वे तीनों जानते थे कि एक दूसरे के विरोध में आए हैं. इसी बीच अजीत जोगी ने विद्याचरण शुक्ल को याद दिलाया कि जब वे रायपुर कलेक्टर थे, उस वर्ष 1980 में लोकसभा चुनाव के दौरान विद्याचरण शुक्ल का नामांकन भारी राजनीतिक दबाव के बावजूद स्वीकार कर लिया था. उसके बाद वीसी ने जोगी से वायदा किया था कि वे अजीत जोगी के उस उपकार को कभी नहीं भूलेंगे और जीवन में जब कभी अजीत जोगी संकट में होंगे तो वे उनकी खुलकर मदद करेंगे

रेणु लिखती हैं कि खाण्डेकर के कमरे में अजीत जोगी ने विद्या चरण शुक्ल द्वारा किया गया प्रण उनको याद दिलाया और उनसे अनुरोध किया कि वे अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करें और अजीत जोगी का विरोध करना छोड़कर नरसिम्हा राव से उनके पक्ष में सिफारिश करें. विद्याचरण शुक्ल बड़े कुशाग्र बुद्धि के राजनीतिज्ञ थे, उन्होंने तत्काल अजीत जोगी को उत्तर दिया कि, “वायदा तो मैंने ब्यूरोक्रेट आईएएस अजीत जोगी से किया था ना कि सांसद व पॉलिटिशियन अजीत जोगी से, इसलिए उस वायदे को निभाना असंभव है. सवाल ही नहीं उठता.” अजीत के बार-बार अनुरोध करने पर भी वे अपनी बात पर अडिग बने रहे.

हालांकि किताब में रेणु जोगी ने इस बात का जिक्र नहीं किया है कि किन परिस्थितियों में विद्याचरण शुक्ल का नामांकन में भारी राजनीतिक दबाव के बीज जोगी ने रायपुर कलेक्टर रहते हुए स्वीकार किया था. यह रहस्य बरकार है.