भक्तों पर अकारण करुणा करने वाले भगवान भोलेनाथ का विराट स्वरूप उन्हें देवों के देव महादेव बना देता है. महादेव की तरफ जब काम अपने कदम बढ़ाता है तो भगवान भोलेनाथ अपने त्रिनेत्र को खोलकर उसे भस्म कर देते हैं, लेकिन वहीं महादेव पूर्णिमा की उस श्वेत कांतिमय वातावरण में जहां कामरहित प्रेम की सुगंध चारों ओर देखते हैं, तो गोपी बन कर उस महारास में शामिल हो जाते हैं.

हमेशा अवधूत भस्मी रमाये महादेव जीव की सबसे बड़ी चिंता और सत्य का बोध कराते हैं, और गोपी के रूप में जीवन के परमानंद प्रेम को परिभाषित करते हैं. भोलेनाथ आप को संदेश देते हैं कि हर व्यक्ति के जीवन में प्रेम कितना आवश्यक हैं, उसका क्या महत्व है. वृंदावन जब आप जाएंगे तो वहां पर महादेव गोपेश्वर महादेव के रूप में विराजमान है.

भगवान श्री कृष्ण की बांसुरी से भोलेनाथ इतने मंत्र मुग्ध हो गए कि घूंघट लेकर नृत्य में शामिल हो गए. अपने तांडव से संपूर्ण विश्व को प्रकंपित कर देने वाले भोलेनाथ बांसुरी की मधुरतान में नृत्य कर रहे थे. श्री कृष्णा भोलेनाथ को पहचान लेते हैं, और उन्हें गोपेश्वर के नाम से पुकारते हैं.

श्री कृष्णा भोलेनाथ से आग्रह करते हैं कि आप इसी रूप में वृंदावन में विराजित हों, आग्रह को सहर्ष स्वीकार करते हुए भोलेनाथ आज भी इसी रूप में वृंदावन में विराजमान हैं. शिवजी गोपी के रूप में यहां पूजे जाते हैं, राधा कृष्ण जी ने सर्वप्रथम गोपेश्वर महादेव की पूजा की थी. मान्यता के अनुसार, आज भी उनकी उंगलियों के निशान गोपेश्वर महादेव के ऊपर हैं.

आज के समय में यदि आप बड़े हैं शक्ति संपन्न हैं तो आप नियमों को स्वीकार करने में असहज हो जाते हैं, अपनी शक्ति सामर्थ्य का प्रदर्शन करते हैं, भगवान भोलेनाथ को देखिए उनके लिए क्या कार्य असंभव है, पर भी जब उन्होंने देखा की महारास में जाने का नियम है, वहां श्री कृष्ण ही पुरूष हैं, बाकी सभी गोपियां.

भगवान नियम का पालन करते हुए गोपी के रूप में महारास में शामिल होते हैं, जबकी महादेव पौरुष के प्रतीक हैं, वह जानते की यहां शक्ति नहीं, भक्ति की जरूरत है, और स्वीकार कर लेते हैं गोपी बनना. आज हमारे जीवन में सबसे बड़ी कमी श्रद्धा और विश्वास की है. यदि जीवन में यह प्रगाढ़ है, तो जीवन में संत्रास नहीं, महारास की प्राप्ति होती है.

श्रद्धा और विश्वास को ही शिव और शक्ति बताया गया

भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।

आत्मशक्ति के लिए श्रद्धा और विश्वास का होना बहुत जरूरी है. भगवान का कृपा पात्र होने के लिए श्रद्धा और विश्वास का होना आवश्यक है, यह हमारी अंतःकरण की शक्तियां हैं. आपने कई लोगों की भक्ति के बारे में सुना होगा, पढ़ा होगा यदि आप उसके मूल में जाएंगे तो शिव और शक्ति स्वरूप में श्रद्धा और विश्वास को ही पाएंगे. उसकी मात्रा ही जीव का कल्याण का मूल मंत्र है. महाशिवरात्रि का यह महा पर्व वास्तव में हमारे जीवन में श्रद्धा और विश्वास का संचार करना है.

हर हर महादेव…

संदीप अखिल,
सलाहकार संपादक,
न्यूज़ 24 / लल्लूराम डॉट कॉम