Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

गाइडलाइन

जमीन का सरकारी भाव कम था। सरकारी कागजों पर लिखे अंक बाजार की औकात से पीछे रह गए थे। बाजार और सरकारी दर का अंतर खत्म करना था। जमीन पर लगने वाला काला पैसा रोकना था। अधिग्रहण में मुआवजा की रकम किसानों को ज्यादा देनी थी। इसलिए सरकार ने जमीन की गाइडलाइन दरें बढ़ा दी। सरकारी कागज पर कुछ नए आंकड़े लिख दिए गए। खैर, जमीन से जुड़े इस फैसले का जमीन पर कितना असर होगा, यह तो वक्त बताएगा, फिलहाल मुद्दे की बात यह है कि जमीन की गाइडलाइन दर बढ़ने के बाद जो माहौल बनाया जा रहा है, वह किसी आर्थिक सुधार से ज्यादा आर्थिक पहेली की तरह है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जमीन की खरीदी में पहले कच्चा-पक्का पैसा चलता था। सरकारी भाव में रजिस्ट्री होती थी और अंतर का पैसा कच्चे में दिया जाता था। अब कच्चे की गुंजाइश खत्म करने की दलील दी गई है। नौकरीपेशा के लिए यह ठीक दिखता है कि उसे लोन ज्यादा मिलेगा। मगर दिक्कत उस तबके को है, जिसका काला पैसा जमीन के रास्ते बाजार में खप जाया करता था। राजनीति में कमाया गया पैसा, ब्यूरोक्रेट्स की अवैध उगाही, उद्योगपतियों की टैक्स की चोरी रियल स्टेट को सींचती थी। जाहिर है इस फैसले से अब बेचैनी बढ़ गई है। इन सबके बीच सरकार के भीतर भी दो विचारधाराएं सक्रिय है। एक विचारधारा इस फैसले को आर्थिक सुधार से जोड़ रही है और दूसरी विचारधारा इस प्रयोग को आत्मघाती बता रही है। दूसरी विचारधारा कहती है कि हाफ बिजली योजना के झटके से अभी सरकार ठीक से उबरी भी नहीं थी कि करंट से तैरता यह दूसरा तार सरकार ने पकड़ लिया है। राजनीति में सुधार और सियासत में टिके रहने की कोशिश हमेशा टकराती है। जमीन की सरकारी गाइडलाइन दर बढ़ाने का यह मामला कुछ ऐसा ही बन गया है। बहरहाल कुछ फैसलों का असर देर से समझ आता है। यह फैसला भी कुछ ऐसा ही है। 

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लैंड बैंक

जमीन में निवेश अवैध कमाई को खपाने का सबसे वैज्ञानिक, टिकाऊ और पारंपरिक तरीका रहा है। यह कोई आधुनिक आर्थिक मॉडल नहीं है। सूबे के कई उद्योगपति, कई नेता और कई नौकरशाहों ने इस रास्ते ही अपना-अपना लैंड पोर्टफोलियो मज़बूत बना रखा है। अपनी अवैध कमाई को जमीनों में निवेश कर वह उससे नोटों की फसल ले रहे हैं। अब जब गाइडलाइन बढ़ाई गई है, तो बाजार की सबसे बड़ी बेचैनी की वजह यही है। न जाने मंत्री ओ पी चौधरी ने क्या सोचकर तपते तवे में अपना हाथ रख दिया है। ज़ाहिर है नई गाइडलाइन से अवैध कमाई को वैध बनाने की सबसे सहज सुरंग थोड़ी संकरी होगी। अब जब जमीन पर निवेश का रास्ता संकरा होगा, तो लोग सोना, क्रिप्टो जैसे नॉन फिजिकल एसेट की ओर भागते दिखेंगे। अवैध कमाई पर रोक लगाने वाली कोई गाइडलाइन तो है नहीं। अच्छा होता कि एक सुधार इस पर भी लाया जाता। 

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जमीन की खेती

सूबे में नौकरशाह बहुत हुए। कुछ की रुचि फाइलों में रही, कुछ की नीतियों में, कुछ की नीतियों पर लिए जाने वाले फैसलों पर, मगर कुछ की रुचि जमीन के खसरा-खतौनी में रही। सरकारी नौकरी उनके लिए एक जरिया थी, मगर उनका असली लगाव जमीन से रहा। पूर्ववर्ती सरकार में एक ऐसे ही नौकरशाह थे, जिनकी तूती बोला करती थी। उनकी जमीन में निवेश की रुचि इस कदर बढ़ी कि शहर का मानचित्र उनके मुताबिक ख़ुद ब ख़ुद बदल जाता था। उगाही के नए-नए स्टार्टअप से पैसों का पहाड़ बन गया था। कहीं तो खपाना था ही। वह जमीन से जुड़े नौकरशाह थे, सो जमीन पर ही उनकी नजर गई। सूबे के लगभग सभी शहरों की आऊट स्कर्ट की जमीनों में उन्होंने खूब निवेश किया। दिमागदार थे। सो ज़रूरत पड़ने पर लैंड यूज़ भी बदल दिया। सब ठीक चल रहा था कि अचानक केंद्रीय जांच एजेंसियों ने एक दिन उनका दरवाजा खटखटा दिया। पता चला कि साहब जमीन की खेती तो बरसो से कर रहे हैं। खैर, कहा जा रहा है कि अब नई गाइडलाइन आने के बाद उनके सरीखे दूसरे नौकरशाह पर थोड़ी लगाम लग सकेगी। 

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जितना खा नहीं रहे उतना….

बिलासपुर में भाजपा नेता की बेटी की शादी का समारोह था। सभी दिग्गज नेता जुटे थे। खाने की मेज पर चर्चा चल रही थी कि अचानक एक पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता की टिप्पणी चर्चा में आ गई। पूर्व मंत्री ने मौजूदा सरकार के एक मंत्री पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, ‘वह जितना खा नहीं रहे हैं, उतना अपने कपड़ों पर गिरा रहे हैं’। दरअसल मंत्री हाल ही में उस वक्त चर्चा में आ गए थे, जब यह खबर बाहर आई थी कि उन्होंने अपनी महिला मित्र को तीन करोड़ रुपए का एक आलीशान बंगला गिफ्ट किया है। खाने की मेज पर गर्म खाने के बीच इस बात की गर्मागर्म चर्चा छिड़ गई थी। हास परिहास के बीच पूर्व मंत्री की इस टिप्पणी पर और लोगों ने भी अपनी किस्म-किस्म की राय रखी। मगर मूल बात यह निकलकर बाहर आई कि मंत्रिमंडल के ज्यादातर चेहरे नए हैं। पहली बार मंत्री की कुर्सी नसीब हुई है और कुछ मंत्री पहली बार में ही सब कुछ समेट लेने पर आमादा हैं। राजनीति की किताब में उन्होंने ‘सब्र’ नाम का अध्याय पढ़ा ही नहीं। पढ़ लेते, तो यूं चर्चा में न आते। खैर, पूर्व मंत्री की टिप्पणी काबिलेगौर है। 

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इशारा

सरकार ने 13 आईएएस अफसरों के तबादले कर दिए। यूं तो कोई सुगबुगाहट नहीं थी कि हाल फिलहाल तबादले की सूची आएगी, लेकिन नौकरशाही में हालात देखकर तबादले किए जाते हैं। हर तबादले की अपनी वजह है। स्वास्थ्य महकमा अफसरों के आपसी टकराव का केंद्र बन गया था। सरकार हर दिन की शिकायत से परेशान थी। सरकार ने सचिव को छोड़कर सबको इधर से उधर करना ही बेहतर समझा। ऐन धान खरीदी के वक्त मार्कफेड की एमडी किरण कौशल एक एक्सीडेंट में चोटिल हो गई थी, लिहाजा उनकी जगह जितेंद्र शुक्ला को लाया गया है। आबकारी में सचिव आर शंगीता का भार कम करते हुए पदुम एल्मा को छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉर्पोरेशन और ब्रेवरेज कॉर्पोरेशन की जिम्मेदारी दी गई है। तबादले की सूची में 13 आईएएस अफसरों में से सात अफसर प्रमोटी आईएएस हैं। ब्यूरोक्रेसी में इस पर चर्चा तेज है कि प्रमोटी आईएएस अफसरों पर सरकार ज्यादा भरोसा जता रही है। सूची में जितेंद्र शुक्ला, पदुम एल्मा, इफ्फत आरा, संतन जांगड़े, रेणुका श्रीवास्तव, रीता यादव, लोकेश कुमार के नाम शामिल हैं। एक सीनियर ब्यूरोक्रेट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि सरकार का दिया गया यह एक तरह का इशारा है।

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बदली हुई कांग्रेस

कांग्रेस बदली हुई दिख रही है। एआईसीसी ने 41 नए जिला अध्यक्षों के नाम की घोषणा कर दी। इस दफे अध्यक्षों के चुनाव का एक फार्मूला अपनाया गया। नेपोटिज्म नहीं चला। किसी तरह की पैरवी काम नहीं आई। संगठन का नेतृत्व जमीनी नेताओं के हिस्से ही आया। यह जरूर है कि कुछ बड़े नेताओं ने इधर-उधर के समीकरणों से अपने मोहरो को कुर्सी दिला दी, लेकिन फिर भी सूची शामिल नाम बेहतर बताए जा रहे हैं। बावजूद इसके सरसरी निगाह से सूची के नामों को देखने पर मालूम चलता है कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समर्थकों को अच्छी खासी जगह मिली है। कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच भी भूपेश बघेल की टीम जमीन पर मजबूत दिख रही है। यह टीम आने वाले दिनों में कांग्रेस के भीतर की राजनीति को एक नया आयाम देते दिखाई पड़ सकते हैं। कांग्रेस को एक बड़े बदलाव से गुजरना बाकी है। 

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