नई दिल्ली. ‘प्रत्याघात’…यह महज शब्द नहीं बल्कि उस बेहतरीन उपन्यास का वो शीर्षक शब्द है, जिसका रविवार को राष्ट्रीय राजधानी के भारत मंडमप में विश्व पुस्तक मेले-2026 में सुप्रसिद्ध लेखिका चित्रा मुद्गल द्वारा विमोचन किया गया है. उपन्यास हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ब्रह्मवीर सिंह द्वारा रचित है. जो मूल रूप से इससे जुड़ी हुई उनकी पहली कृति ‘बुत मरते नहीं’ के दूसरे भाग के रूप में उसके आगे की कहानी बयां करता है. लोकार्पण समारोह में प्रसिद्ध कवि पद्मश्री डॉ.सुनील जोगी, लेखक-कवि एवं दैनिक हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक प्रताप सोमवंशी और हरिभूमि समाचारपत्र समूह के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी भी उपस्थित रहे. उपन्यास को प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. इस अवसर पर हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक प्रताप सोमवंशी ने कहा कि उपन्यास की पंक्तियों को पढ़कर लगा कि लेखक मुक्तिबोध की धरती से आया है.

न्याय की प्रति है प्रत्याघात: सिंह

उपन्यास के लेखक ब्रह्मवीर सिंह ने कार्यक्रम में बताया कि ‘प्रत्याघात’ का पहला भाग ‘बुत मरते नहीं’ एक प्रकार से पाठकों के मन में असत्य यानी बुराई की जीत के रूप पहुंचा था. उनका कहना था कि आपने नैतिकता, परंपराओं और सनातन प्रवृत्ति के विरूद्ध लिख दिया है. इसके नायक की ही जान चली गई और उसका पिता, जो आदर्शवादी जीवन जीता था. वो अवसाद से ग्रसित हो जाता है. कुछ ऐसा ही उसके अन्य संबंधों के साथ भी हुआ. आमतौर पर लोगों के मन में सत्य को जीतता हुआ देखने की प्रबल धारणा होती है. इसलिए लगा कि असत्य की जीत के साथ जो अन्याय हुआ था. उसे न्याय की प्रति के साथ प्रत्याघात के रूप में पाठकों के साथ साझा करूं. यह उन सभी सवालों के जवाब देता है, जो बुत मरते नहीं में अधूरे रह गए थे. मेरा उपन्यास हर उसकी व्यक्ति की कहानी है, जो हताशा, अवसाद में हैं, जो हार गए हैं और जिन्होंने ये मान लिया था कि सत्य के साथ चलना बेहद कठिन है और जो टूट गए थे. साथ ही यह उन सभी की कहानी है जो टूटे थे, मिटे नहीं. मेरा प्रयास सफल रहा और प्रभात प्रकाशन का जो सहयोग मिला. वह सराहनीय है.

लेखक ने की पुस्तकें पढ़ने की अपील

ब्रह्मवीर कहते हैं कि नए उपन्यास को लेकर उन्हें प्रशंसा और आलोचना दोनों मिली हैं. पत्रकारिता में कुल ढाई दशक हो गए हैं और यह मेरी चौथी पुस्तक और तीसरा उपन्यास है. लेकिन आज विश्व पुस्तक मेले में चित्रा मुद्गल के हाथों से मेरे उपन्यास का लाकार्पण होना, मेरे अब तक के साहित्यिक सफर का सबसे सुखद अहसास कराता है. उन्होंने कार्यक्रम में शामिल हुए सभी लोगों से मोबाइल की स्क्रीन से ध्यान हटाकर पुस्तकें पढ़ने का अनुरोध किया है. पूर्व में ब्रह्मवीर सिंह नक्सलवाद पर केंद्रित उपन्यास दंड का अरण्य पर साहित्यिक जगत में काफी चर्चा हुई. वहीं, इस पर अनेकों शोधकार्य हुए हैं. इसके अलावा बुत मरते नहीं का पहला भाग जातिवाद के भेदभाव से इतर मित्रता के चरम की कहानी है.

प्रयास निरर्थक नहीं जाएगा: डॉ. द्विवेदी

कार्यक्रम के समापन पर सभी अतिथियों का धन्यवाद करते हुए हरिभूमि समाचारपत्र समूह के प्रधान संपादक डॉ.हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि आज का यह आयोजन मेरे लिए निजी तौर पर प्रसन्नता का अवसर है. क्योंकि जैसा कि पहले ब्रह्मवीर कह रहे थे कि हमने कई अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं, लेकिन यह उपन्यास उन सभी से कुछ अलग है. बतौर साहित्यकार के रूप में ब्रह्मवीर इस पुस्तक को लाने में सफल रहे हैं. हमने पूर्व में दो किताबों का लोकार्पण रायपुर में किया है. जिनकी वजह ये रही कि एक पत्रकार के तौर पर रायपुर में पिछले 15, 20 या 25 वर्षों में जो प्रतिष्ठा ब्रह्मवीर ने अर्जित की थी. उसे देखकर लगा कि संबंधित आयोजन रायपुर में ही होना चाहिए. पर इनकी निरंतरता, पत्रकारिता में भी पूरी गंभीरता के साथ कार्य करने की वजह से जरूरी था कि इन्हें साहित्यिक क्षेत्र में भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए. इसलिए यह इच्छा जगी कि आज का यह आयोजन नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में होना चाहिए. प्रयास प्रभात प्रकाशन द्वारा किया गया. यहां सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आदरणीय चित्रा जी का जो आशीर्वाद ब्रह्मवीर को मिला है, वो निरर्थक नहीं जाएगा. उन्होंने डॉ.सुनीश जोगी, प्रताप सोमवंशी जी के प्रति भी अपनी ओर से आभार जताया. साथ ही कहा कि मेरा मानना है कि ब्रह्मवीर का यह प्रयास लगातार चलता रहेगा और वे यूं ही लिखते रहेंगे और हम इन्हें पढ़ते रहेंगे.

सोमनाथ बोले-ऐसे लगा लेखक जैसे मुक्तिबोध की धरती से आया

हिंदुस्तान के प्रबंध संपादक प्रताप सोमवंशी ने ब्रह्मवीर को बधाई देते हुए उपन्यास का अगला भाग लिखने की अपील की और कहा कि पत्रकारों को समय निकालकर लेखन जरूर करना चाहिए. क्योंकि वो अपने जीवन के अनुभव में जितने पात्रों से मिलते हैं और उनसे जुड़े हुए जिन अनुभवों को संजोते हैं. उनकी मदद से हमारे पास अनुभवों का जो वृहद संसार होता है, अन्य के पास वैसा संभव नहीं है. पत्रकार के अनुभव से साहित्य बेहद समृद्ध बन सकता है. लेकिन ये हमारा दुर्भाग्य रहा है कि पत्रकारों के लिखे हुए साहित्य को बहुत अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया है. कुछ गिने चुने आइकॉन बना दिए गए हैं. सब कुछ उन्ही के ईदगिर्द घूमता है. सोमवंशी ने कहा, मैंने पूरा उपन्यास पढ़ा है. इसमें सबसे बड़ी चीज ये है कि किसी घटना से प्रेरित होकर कोई पात्र इनके जीवन में रहा होगा या इनके विचार से उपजा होगा. लेकिन उपन्यास की पंक्तियों को पढ़कर लगा कि लेखक 25 साल से रायपुर में नहीं रह रहा है. बल्कि यह मुक्तिबोध की धरती से आया है. उसकी चेतना से इनका गहरा नाता है. सार रूप में यह उपन्यास जीवन को जीने की यात्रा को दर्शाता है.

हमें जीवन और उसके रस को ढूंढना चाहिए

प्रसिद्ध कवि सुनील जोगी ने कहा कि उपन्यास के पहले वाक्य ने मुझे बहुत अधिक छुआ है. जिसमें लेखक ने कहा है कि प्रत्याघात मनुष्यों के भस्म हो चुके संबंधों की राख से संबंध खोजने निकला है. निश्चित रूप से आज ये बड़ी आवश्यकता है कि हम जीवन को खोजें. वर्तमान में जिस तरह का समाज हो गया है, उसमें जीवन और उसका रस खत्म होता चला जा रहा है. हम अनायस एक नीरसता की तरफ बढ़ते जा रहे हैं. इसलिए समरसता और जीवंतता को बचाने का काम यह उपन्यास करेगा. ऐसी मेरी अपेक्षा है. अपनी बात को सुनील जोगी ने कुछ विशेष पंक्तियों के साथ समाप्त किया, जिसमें उन्होंने कहा, ‘मिटाने वाले कहां तक हमें मिटाएंगे, हम तो शायर हैं किताबों में बिखर जाते हैं’. सार यह है कि जो कुछ भी किताबों में आ गया है. वो मिट नहीं सकता. इसलिए लिखते रहना चाहिए.

सफलता की कहानी दोहराएगा

प्रभात प्रकाशन के प्रभात कुमार ने मंच संभाला और कहा कि लेखक का निरंतर साहित्य सृजन सराहनीय है. ‘बुत मरते नहीं’ की तरह नया उपन्यास भी सफलता की कहानी दोहराएगा, ऐसी मेरी कामना है.