रायपुर। छत्तीसगढ़ में लगभग 45 साल बाद नगर पालिक परिषदों एवं नगर पंचायतों का आय-आधारित वर्गीकरण किया गया है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस संबंध में छत्तीसगढ़ नगरपालिका सेवा (वेतनमान एवं भत्ते) नियम, 1967 में संशोधन करते हुए नियम–3 को प्रतिस्थापित कर दिया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार नगरीय निकायों का वर्गीकरण अब उनकी वार्षिक आय के आधार पर निर्धारित किया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले इस तरह का वर्गीकरण सन 1980 में किया गया था। अब 45 वर्षों के अंतराल के बाद राज्य सरकार ने नगर निकायों की आर्थिक स्थिति के अनुरूप नई श्रेणियां तय की हैं।

नई श्रेणियां इस प्रकार निर्धारित की गई हैं—

श्रेणी “क”

वे नगर पालिक परिषदें/नगर पंचायतें, जिनकी वार्षिक आय 4.00 करोड़ रुपये या उससे अधिक हो।

श्रेणी “ख”

वे नगर पालिक परिषदें/नगर पंचायतें, जिनकी वार्षिक आय 2.00 करोड़ रुपये या उससे अधिक लेकिन 4.00 करोड़ रुपये से कम हो।

श्रेणी “ग”

वे नगर पालिक परिषदें/नगर पंचायतें, जिनकी वार्षिक आय 90.00 लाख रुपये या उससे अधिक लेकिन 2.00 करोड़ रुपये से कम हो।

श्रेणी “घ”

वे नगर पालिक परिषदें/नगर पंचायतें, जिनकी वार्षिक आय 90.00 लाख रुपये से कम हो।

वार्षिक आय की परिभाषा

अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि इन नियमों के प्रयोजन के लिए किसी भी नगर पालिक परिषद या नगर पंचायत की वार्षिक आय उसकी समस्त वार्षिक आय मानी जाएगी। हालांकि, कुछ विशिष्ट प्रयोजनों के लिए प्राप्त सहायता अनुदान को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।

सरकार के इस फैसले से नगरीय निकायों की आर्थिक स्थिति के अनुरूप उनका वर्गीकरण अधिक पारदर्शी और व्यावहारिक हो जाएगा। माना जा रहा है कि इससे अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतनमान, भत्तों और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं में एकरूपता आएगी। साथ ही नगर निकायों के वित्तीय प्रदर्शन के आधार पर उन्हें बेहतर ढंग से श्रेणीकृत किया जा सकेगा।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय नगरीय निकायों के प्रशासनिक ढांचे को मजबूत करने और उनकी वित्तीय क्षमता के अनुरूप व्यवस्था तय करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। इससे राज्य के शहरी स्थानीय निकायों के संचालन में अधिक स्पष्टता और अनुशासन आने की उम्मीद है।