वीरेन्द्र गहवई, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध काँगेर वैली नेशनल पार्क स्थित ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने और उसके प्रवेश द्वार पर गेट, सीढ़ी व पाथवे जैसी संरचनाओं के निर्माण के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर आज हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से बताया गया कि कुछ असामाजिक तत्व गुफा की दीवारों पर अपने नाम खोद देते हैं, जिससे गुफा को नुकसान पहुंच रहा है। इसी कारण गुफा के संरक्षण के उद्देश्य से गुफा के बाहर निर्माण कार्य कराया जा रहा है।

बता दें कि इस पर हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि गुफा को आम जनता से बचाने के लिए ऐसे कार्य किए जा सकते हैं, जिनसे उसकी प्राकृतिक विरासत को कोई खतरा न हो। कोर्ट ने इस मामले में काँगेर वैली नेशनल पार्क के संचालक से शपथ-पत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।

याचिकाकर्ता ने पर्यटन को बढ़ावा देने का लगाया आरोप
रायपुर निवासी नितिन सिंघवी द्वारा दायर जनहित याचिका में कोर्ट को बताया गया कि वन विभाग संरक्षण के नाम पर वास्तव में ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने की तैयारी कर रहा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, गुफा के प्रवेश द्वार पर गेट, सीढ़ी और पाथवे का निर्माण पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि 24 दिसंबर 2025 को वन विभाग की एक बैठक में काँगेर वैली नेशनल पार्क के संचालक ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से ग्रीन गुफा के प्रवेश द्वार, सीढ़ी और पाथवे के निर्माण की योजना प्रस्तुत की थी। इस बैठक में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) ने जनवरी माह के अंत तक गुफा को पर्यटकों के लिए खोलने के निर्देश दिए थे। साथ ही गुफा को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए साइनेज, फोटो और वीडियो के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार करने के निर्देश भी दिए गए थे।
BSIP ने जताई गंभीर चिंता
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि ग्रीन गुफा को पर्यटन के लिए खोलने और निर्माण कार्य के संबंध में भारत सरकार की प्रतिष्ठित संस्था बीरबल साहनी इंस्टिट्यूट ऑफ पेलियोसाइंसेज़ (BSIP), लखनऊ से विशेषज्ञ राय ली गई थी। यह राय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई।
BSIP के निदेशक प्रोफेसर डॉ. महेश जी. ठक्कर ने अपनी विशेषज्ञ राय में स्पष्ट रूप से कहा कि गुफा के प्रवेश द्वार के अत्यंत निकट रेत, बजरी और लोहे की छड़ों जैसी निर्माण सामग्री का भंडारण और उपयोग विशेष रूप से चिंताजनक है। उन्होंने चेताया कि ऐसे सिविल कार्यों से प्राकृतिक ड्रेनेज और सीपेज पैटर्न में बदलाव आ सकता है, जिससे गुफा के भीतर गाद और धूल का प्रवेश बढ़ेगा। इससे वायु प्रवाह, माइक्रो-क्लाइमेट और रासायनिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, जो गुफा के इकोसिस्टम को पर्यटन शुरू होने से पहले ही अपरिवर्तनीय क्षति पहुंचा सकता है।
डॉ. ठक्कर ने जोर देकर सलाह दी कि जब तक विस्तृत बहुविषयक वैज्ञानिक अध्ययन पूरे नहीं हो जाते, तब तक सभी निर्माण और पर्यटन संबंधी गतिविधियां तत्काल रोक दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ग्रीन गुफाएं पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे नाजुक और संवेदनशील प्राकृतिक तंत्रों में से हैं। विशेष रूप से चूना-पत्थर की वे गुफाएं, जिनमें दुर्लभ फोटोसिंथेटिक या कीमो-सिंथेटिक माइक्रोबियल परतें पाई जाती हैं, हजारों से लाखों वर्षों में विकसित होती हैं और मानव हस्तक्षेप के प्रति अत्यंत असहिष्णु होती हैं।
बिना वैज्ञानिक अध्ययन पर्यटन खोलना बताया खतरनाक
BSIP निदेशक ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना किसी विस्तृत वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) के ग्रीन गुफा को आम जनता के लिए खोलना वैज्ञानिक दृष्टि से गंभीर भूल होगी। इससे ऐसा नुकसान हो सकता है जो तुरंत दिखाई न दे, लेकिन गुफा की सूक्ष्म पारिस्थितिकी को स्थायी रूप से बदल या समाप्त कर सकता है। एक बार यदि यह प्राकृतिक प्रणाली बाधित हो जाती है, तो मानव समय-सीमा में इसका पुनर्स्थापन लगभग असंभव होता है।
स्थानीय विशेषज्ञों ने भी किया समर्थन
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के पूर्व प्रोफेसर एवं स्कूल ऑफ स्टडीज़ इन लाइफ साइंस के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. ए. के. पति से भी विशेषज्ञ राय ली गई थी। डॉ. पति ने अपनी लिखित राय में कहा कि काँगेर वैली राष्ट्रीय उद्यान की गुफाएं, विशेष रूप से कुटुमसर केव कॉम्प्लेक्स और ग्रीन केव, अत्यंत नाजुक, संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक मूल्यवान पारिस्थितिक तंत्र हैं।
उन्होंने कहा कि इन गुफाओं का सूक्ष्म जलवायु तंत्र, सूक्ष्मजीव समुदाय और गुफा-अनुकूलित जीव अत्यंत दीर्घकाल में विकसित होते हैं और मानव हस्तक्षेप के प्रति बेहद कम सहनशील होते हैं। डॉ. पति ने स्पष्ट रूप से राय दी कि ग्रीन केव जैसी अत्यधिक संवेदनशील गुफाओं को पर्यटन के बजाय केवल वैज्ञानिक अनुसंधान और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
फिलहाल, हाईकोर्ट ने मामले में राज्य शासन से विस्तृत जवाब और पार्क प्रबंधन से शपथ-पत्र तलब कर लिया है। अब इस संवेदनशील पर्यावरणीय मुद्दे पर अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को होगी, जिस पर ग्रीन गुफा के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय होने की संभावना है।
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