चंडीगढ़। हाईकोर्ट ने जिला अदालतों द्वारा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को बिना ठोस आधार के बचाव पक्ष के गवाह के रूप में तलब किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि जिन अधिकारियों की किसी मामले की जांच में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती, उन्हें केवल ध्यान आकर्षित करने या मुकदमे को लटकाने के उद्देश्य से तलब करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
यह टिप्पणी जालंधर की एक अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें लुधियाना के पुलिस आयुक्त स्वपन शर्मा को एनडीपीएस मामले में गवाह के रूप में तलब किया गया था। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या महज सीसीटीवी रिकार्ड देने के लिए पुलिस आयुक्त को बुलाने की क्या आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आदेश न केवल न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालते हैं, बल्कि समयबद्ध एनडीपीएस मामलों को जानबूझकर लंबा खींचने का जरिया भी बनते हैं।

हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिकारियों को तलब करने के लिए जमानती वारंट जारी किए जाने पर भी आश्चर्य जताया। जब बचाव पक्ष कोई संतोषजनक आधार नहीं दे सका, तो पीठ ने कहा कि ईमानदार और गैर जांचकर्ता अधिकारियों को सिर्फ मीडिया सुर्खियां बटोरने या देरी की रणनीति के लिए कटघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता।
बड़ी एनडीपीएस रिकवरी से जुड़ा मामला
यह एनडीपीएस मामला जालंधर कमिश्नरेट पुलिस के एक सुव्यवस्थित, दो महीने लंबे अभियान से जुड़ा है। मार्च 2024 में अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ तस्करी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ था, जो कूरियर चैनलों के जरिए ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा तक फैला था। इस ऑपरेशन में 9 आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। 22 किलो अफीम बरामद की गई। कोर्ट ने कहा कि जब पुलिस आयुक्त की ओर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की औपचारिक अनुमति मांगी गई थी, तब जिला अदालत को उस पर विचार करना चाहिए था।
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