Column By- Ashish Tiwari, Resident Editor Contact no : 9425525128

चर्चा में आईजी साहब

पिछले हफ्ते एक आईजी साहब खूब चर्चा में रहे। उनके चर्चा में बने रहने की वजह यह थी कि पिच पर आते ही वह पूरे फार्म में थे। रेंज की जिम्मेदारी मिलते ही सबसे पहले उन्होंने अपने एक शूटर को बुलाया। आईजी का शूटर महादेव सट्टा घोटाले का प्रसाद चख चुका एक कांस्टेबल था, पर न जाने कैसे वह घोटाले की आंच से बच निकला था। आईजी का हाथ कांस्टेबल के कंधे पर था। लोगों को यह बात समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी सिर्फ एक मामूली कांस्टेबल भर नहीं है। यही आईजी की परछाई है। सरकारी व्यवस्था में ऊंचे ओहदे पर बैठा व्यक्ति अक्सर अपनी एक परछाई साथ लेकर चलता है। इससे बदनामी के छींटे सीधे-सीधे उस पर नहीं लगते। परछाई ढाल की तरह काम करती है। आईजी साहब जिस तात्कालिक व्यवस्था में जहां ठहरे हुए थे, वहां पहुंचकर कांस्टेबल ने मोर्चा संभाल लिया। उसने एक-एक कर बड़े सट्टेबाजों के साथ मीटिंग की। गांजा तस्करों के साथ लंबा डिस्कशन किया। अवैध शराब बेचने वालों से खपत के तौर तरीके समझते हुए धंधा बढ़ाने के फार्मूले पर सहमति बनाई। पूरे प्रोफेशनल अंदाज में यह सब चल रहा था। आईजी की परछाई यानी कांस्टेबल ने सभी को यह कहते हुए हरी झंडी दे दी कि जो काम अब तक रुके हुए थे, उन्हें अब बगैर रुकावट बहाल कर दो। मगर रेंज के एक जिले की एसपी की धमक इतनी थी कि उनकी आमद के बाद से सब ने अपने-अपने धंधे से छुट्टी ले रखी थी। उस जिले के एक बड़े सट्टेबाज ने दो टूक कह दिया, एसपी के रहते इस जिले में मैं काम नहीं करूंगा। आईजी के इशारे पर कांस्टेबल ने कहा, तो दूसरे जिले में धंधा जमा लो। कांस्टेबल का रौब अब खुलकर दिखने लगा था। आईजी जिस कमरे में लोगों से मिलते-जुलते थे, उसी कमरे के एक किनारे पर लगे सोफे पर कांस्टेबल साहब पैर ऊपर पैर चढ़ाकर बैठने लगे। लोगों को समझा दिया गया था कि सोफे पर बैठे ‘पांडेय जी’ सिर्फ एक कांस्टेबल नहीं है। यह आईजी की परछाई हैं। ये जो कहें, उसे सुन लेना है। सुनकर बैठना नहीं है। उस पर अमल करना है। राज्य बहुत छोटा है। रेंज छोटा है। इस पर जोरदार हल्ला मचना ही था। हल्ला मचा और ऊपर बैठे अफसरों ने आईजी को जमकर फटकार लगाई। अफसरों को लग रहा था कि अब सब रुक जाएगा। मगर सब यह भूल गए थे कि आईजी साहब रिटायरमेंट की दहलीज पर खड़े हैं। दहलीज पर खड़ा आदमी नियमों से नहीं चलता। कई बार वह इतना ढीठ हो जाता है कि उसे फटकार का अहसास तक नहीं होता। वह सोचता है कि अब दिन ही कितने बचे हैं।

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स्पष्टीकरण 

आईजी साहब की रफ़्तार को समझने के लिए उनके कदमों को नहीं, उनकी चिट्ठियों को देखना चाहिए। पूरे रेंज के थाना प्रभारियों में इन दिनों एक ही चर्चा है,  स्पष्टीकरण पर स्पष्टीकरण। रौब जमाने का यह सबसे सुरक्षित तरीका है। बस एक कागज चलता है और नीचे तक रीढ़ सीधी हो जाती है। पिछले दिनों एक थाना प्रभारी ने वही किया, जो कानून उसे करने की अनुमति देता है। उसके इलाके में प्रतिबंधित धाराओं के बावजूद अवैध काम हो रहा था। उस पर कार्रवाई हुई। जुर्माना लगाया गया और कानून के प्रावधानों के तहत आरोपी को छोड़ दिया गया। कानून को यह नहीं मालूम था कि आईजी साहब इस समय पूरे फ़ॉर्म में हैं। आईजी साहब का फोन सीधे थाना प्रभारी को गया और उन्होंने थाना प्रभारी को खूब डांट पिलाई। उनका सवाल बहुत साधारण था “मुझसे पूछे बगैर क्यों छोड़ दिया गया?” अब थाना प्रभारी के दायरे में आने वाले काम पर भी अगर आईजी की अनुमति ज़रूरी हो जाए, तो समझ लीजिए कि थाना प्रभारियों की क्या हैसियत रह गई है? इस रेंज में थाना प्रभारी अपराधिक घटनाओं पर जितने बेचैन नहीं हो रहे, उससे ज्यादा आईजी की चिट्ठी उन्हें बेचैन कर रही है। कब किस बात पर आईजी की चिट्ठी आ जाए, यह कोई नहीं जानता। सुनते हैं कि आईजी की चिट्ठी का मजमून लगभग तय रहता है। यह पूछा जाता है कि  “क्यों न आपकी एक वेतनवृद्धि रोक दी जाए?”  अब भला कौन थाना प्रभारी अपने वेतन से समझौता करना चाहेगा। दरअसल चर्चा तो यही है कि इस किस्म की चिट्ठियों की आड़ में आईजी साहब दूसरे किस्म के समझौते की उम्मीद थाना प्रभारियों से कर रहे हैं। थाना प्रभारियों को मैनेज करने की जिम्मेदारी भी कांस्टेबल के कंधों पर थी, मगर ऊंचे बैठे अधिकारियों की सीधी नजर होने पर उसके पर कतर दिए गए हैं। वैसे भी उसकी पोस्टिंग दूरदराज के जिले में थी। भौतिक रूप से वह रेंज में नहीं है, लेकिन कहा जाता है कि थाना प्रभारियों और अवैध धंधों के सौदागरों को उसकी परछाई आईजी के इर्द-गिर्द ही कहीं लटकती दिखती है। 

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एफआईआर 

सत्ताधारी दल के एक पूर्व विधायक से एक महिला का प्रेम प्रसंग चल रहा था। प्रेम कोई गुनाह नहीं है। यह तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर किसी से भी हो सकता है। पूर्व विधायक को ढलती उम्र में हुआ था। मगर एक आंदोलन ने पूर्व विधायक के प्रेम संबंध की बलि ले ली। पूर्व विधायक के खिलाफ एफआईआर हुआ सो अलग। दरअसल पिछले दिनों एक जिले में बड़ा आंदोलन हुआ था। आंदोलन की अगुवाई करने वाली महिला ही पूर्व विधायक की प्रेयसी निकल गई। इस आंदोलन से पूर्व विधायक की स्थानीय राजनीति और निजी हित दोनों प्रभावित हो रहा था। पूर्व विधायक ने अपनी राजनीतिक जमीन को बचाए रखने के लिए पहले आंदोलन की अगुवाई करने वाली महिला का खूब मान मनौव्वल किया। मगर बात बनी नहीं। पूर्व विधायक के सामने एक तरफ बची खुची राजनीति थी और दूसरी तरफ उनका प्रेम था। चुनाव बड़ा कठिन था। पूर्व विधायक ने राजनीति को चुन लिया। सुनते हैं कि उन्होंने महिला को व्हाट्स एप पर एक पुरानी अंतरंग तस्वीर भेज दी। तब तक पूर्व विधायक को यह उम्मीद नहीं थी कि व्हाट्स एप पर भेजी गई तस्वीर उनके लिए मुसीबत लेकर आएगी। महिला ने उस तस्वीर को आधार बनाकर थाने में शिकायत कर दी। लोगों ने पूर्व विधायक को खूब समझाया कि माफी मांग लो। बात दबी रह जाएगी। मगर पूर्व विधायक ने माफी नहीं मांगी। पुलिस आंदोलन से पहले ही दबाव में थी। अब सुनते हैं कि महिला की शिकायत पर पूर्व विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। सत्ताधारी दल के पूर्व विधायक के खिलाफ एफआईआर होना बड़ी बात है। फिलहाल इस एफआईआर पर कोई चर्चा नहीं है। जिले की पुलिस ने इसे सेंसिटिव लिस्ट में डाल रखा है। 

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जंगलराज

सूबे के एक विभाग में एक उच्च पदस्थ अफसर कईयों की आंखों का कांटा बन गए हैं। कांटा बनने की कई वजह है। अव्वल तो यह कि विभाग की तीन-तीन बड़ी जिम्मेदारियां उन्होंने हासिल कर रखी है और दूसरा यह कि कई मजबूत दखल के बावजूद अफसर की कुर्सी टस से मस नहीं हो रही है। न मंत्री कुछ कर पा रहे हैं और न ही सत्ता के केंद्र में बैठे लोग। पता चला है कि मंत्री ने खुद अफसर का प्रभार कम करने के लिए कई बार नोटशीट लिखा है, मगर उन नोटशीट्स का क्या हुआ यह मंत्री भी नहीं जानते। चर्चा यह भी है कि सत्ता के केंद्र से भी कई बार अफसर की कुर्सी को हिलाने की हलचल हुई, मगर हाल ढाक के तीन पात जैसा रहा। अफसर का पैर मानो अंगद का पैर बन गया हो। खैर, विभाग में अब लोग यह खुलकर कहने लगे हैं कि यहां जंगलराज चल रहा है। हाल बेहाल है और उच्च पदस्थ अफसरों के नए-नए नाम रखे जा रहे हैं। कोई किसी को धृतराष्ट्र कहता है, तो कोई किसी को गांधारी। अंगद ने तो पैर जमा ही रखा है। 

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कलेक्टर के नाम पर वसूली

धान खरीदी पर खूब गंध मची। शिकवे शिकायतों का अंबार लगा रहा। जैसे-तैसे काम पूरा हुआ। खैर, फिलहाल ताजी बात एक जिले की है, जहां एक जिला खाद्य अधिकारी की दिलेरी चर्चा में रही। जिले में कुल 102 उपार्जन केंद्र थे और हर केंद्र से 50 हज़ार रुपए की वसूली की गई और वह भी कलेक्टर के नाम पर। हैरानी की बात यह रही कि कलेक्टर को भी इस वसूली की जानकारी नहीं थी। सरकारी रिकार्ड में धान खरीदी से जुड़ी गड़बड़ियों को लेकर इस जिले में ही सबसे ज्यादा कार्यवाहियां दर्ज है। यह बात और है कि जिला खाद्य अधिकारी की करतूतें उजागर होने के बाद उसे सस्पेंड कर दिया गया था। 

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मौसम

तबादलों को मौसम आ रहा है। धान खरीदी खत्म हो गई है और एसआईआर का काम 14 फरवरी तक पूरा हो जाएगा। सेंट्रल डेपुटेशन पर जा रहे बलौदाबाजार कलेक्टर दीपक सोनी रिलीव होंगे। सरकार बनने के बाद कलेक्टरों और एसपी की जो सूची जारी की गई थी, उनमें से कई अफसर को दो साल से ज्यादा का वक्त बीत गया है, ज़ाहिर है इनमें से कुछ अफसर फील्ड से हटेंगे और कुछ नए फील्ड पर भेजे जाएंगे। मंत्रालय की भी यही कहानी है। ज़्यादातर सेक्रेटरी को अपने विभाग में काम करते अरसा बीत गया है। 23 फरवरी से विधानसभा सत्र शुरू हो रहा है। एक संभावना यह भी है कि सत्र के बाद बड़ी लिस्ट जारी हो और फ़िलहाल एक छोटी लिस्ट से काम चला लिया जाए।