आप अपराध के लिए किसी भूत को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते- दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 साल पुराने केस में फैसला सुनाते हुए पुलिस को फटकार लगाई. जस्टिस विमल कुमार यादव की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए डकैती के दोषी ठहराए गए शख्स (फिरोज अहमद) को एक पुराने लूट और फायरिंग केस में सुनवाई करते हुए आरोपी की सजा रद्द कर दी और उसे बरी कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि क्रिमिनल केस में अपराधी की ‘पहचान’ सबसे अहम होती है. जब अभियोजन पक्ष यह साबित ही नहीं कर पाया कि हमलावर कौन था, तो उसे बेनिफिट ऑफ डाउट आरोपी को मिलना ही चाहिए.
दिल्ली हाईकोर्ट में अपील के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि जांच में कई खामियां हैं. बरामदगी संदिग्ध है और गवाह हमलावर की पहचान पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाया और जांच के कई अहम पहलू भरोसेमंद नहीं थे. मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि किसी भूत को अपराध का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.
कोर्ट ने पाया कि मुख्य घायल गवाह ने बताया था कि घटना के समय अंधेरा था और उसे सिर्फ धुंधले चेहरे दिखे. उसने यह भी कहा कि उसे आंखों की समस्या है इसलिए वह आरोपी की पहचान को लेकर निश्चित नहीं है. दूसरे पीड़ित ने तो हमलावरों को देखा ही नहीं.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक यह मामला जून 2000 का है जब पार्किंग एरिया में दो लोगों पर हमला कर उनसे लूटपाट की गई थी और एक व्यक्ति को गोली भी मारी गई थी. कुछ महीनों बाद आरोपी को एक अलग हथियार मामले में गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने उसके कथित बयान के आधार पर एक ब्रीफकेस बरामद करने का दावा किया, जिसे पीड़ित का बताया गया और इसी के जरिए आरोपी को पुराने केस से जोड़ा गया. ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए कई साल की सख्त कैद की सजा सुनाई थी.
हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा महीनों बाद ब्रीफकेस बरामद किए जाने की कहानी पर सवाल उठाए. पुलिस अधिकारियों के बयानों में यह विरोधाभास था कि ब्रीफकेस कब और कैसे मिला. भीड़भाड़ वाला इलाका होने के बावजूद वहां कोई चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं था? जज ने पुलिस की थ्योरी पर कटाक्ष भी किया.
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