दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि न्यायिक प्रणाली को ऐसा मंच नहीं बनाया जा सकता, जहां वयस्क व्यक्ति अपनी पूरी समझदारी और जानकारी से लिए गए फैसलों को बाद में बदल सकें। कोर्ट ने इस टिप्पणी में व्यक्तिगत स्वायत्तता और कानूनी जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि वयस्क व्यक्ति अपने निर्णय लेने में सक्षम हैं और उनका फैसला उनके निजी और कानूनी अधिकार का हिस्सा है। न्यायपालिका का काम केवल यह सुनिश्चित करना है कि निर्णय उचित और कानूनी रूप से सही हो, न कि वयस्कों द्वारा लिए गए समझदार फैसलों को बदलना।
कोर्ट ने खारिज की याचिका
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जेंडर या धर्म किसी भी तरह का हो, हर वयस्क व्यक्ति अपने फैसलों के लिए खुद जिम्मेदार होता है। यह टिप्पणी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने एक महिला वकील की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए की। याचिकाकर्ता ने अपने पति को बलात्कार और धमकी के आरोपों से बरी करने वाले निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रणाली का उद्देश्य यह नहीं है कि वयस्कों द्वारा पूरी समझदारी से लिए गए निर्णयों को बाद में बदला जाए।
हाई कोर्ट का रुख
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य शिकायतकर्ता के दावों से पूरी तरह अलग तस्वीर पेश करते हैं। अदालत ने माना कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि जब दो शिक्षित वयस्क जानबूझकर ऐसा रिश्ता बनाते हैं जो उनके धर्म या पर्सनल लॉ से अलग हो, तो उसके कानूनी और व्यक्तिगत परिणाम होते हैं। कोर्ट ने दोहराया कि न्यायपालिका का काम यह नहीं है कि वयस्कों द्वारा लिए गए समझदार फैसलों को बाद में बदला जाए।
कानून का नहीं कर सकते गलत इस्तेमाल
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पढ़ा-लिखा वयस्क व्यक्ति लंबे समय तक किसी रिश्ते में रहता है और विभिन्न धार्मिक रीति-रिवाजों में हिस्सा लेता है, तो बाद में रिश्ता खराब होने पर वह कानून का इस्तेमाल केवल अपनी पसंद के नतीजों को मिटाने के लिए नहीं कर सकता।
ये है क्रिमिनल लॉ का मकसद
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि क्रिमिनल लॉ का उद्देश्य असली पीड़ितों की सुरक्षा करना है, न कि उन आपसी सहमति वाले रिश्तों का इतिहास बदलना जिन्हें समाज ने स्वीकार किया हो और जो वर्षों तक चले हों। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए शिकायतकर्ता के वकील होने का जिक्र किया और स्पष्ट किया कि कानून का इस्तेमाल केवल स्वायत्त वयस्कों के समझदारी से लिए गए फैसलों को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।
क्या है मामला
दिल्ली हाई कोर्ट में एक संवेदनशील मामला सामने आया, जिसमें एक हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष, दोनों पेशे से वकील, शामिल हैं। महिला का आरोप था कि प्रतिवादी ने अपनी असली पहचान और पहले से शादीशुदा होने की बात छिपाकर उससे विवाह किया। इसके अलावा उसने आरोप लगाया कि प्रतिवादी ने शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव डाला, न्यूड तस्वीरें लेकर ब्लैकमेल किया, जबरन धर्म परिवर्तन कर शोषण किया
हालांकि, निचली अदालत ने प्रतिवादी को इन आरोपों से बरी कर दिया था। महिला ने इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, जिसे जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने इस दौरान व्यक्तिगत स्वायत्तता और कानूनी जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि वयस्क व्यक्ति अपनी पूरी समझदारी और जानकारी के साथ लिए गए फैसलों के लिए खुद जिम्मेदार होता है, और न्यायिक प्रणाली को इसे बदलने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
दिल्ली हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने व्यक्तिगत स्वायत्तता और कानूनी जिम्मेदारी पर जोर दिया। मामला एक महिला द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका का था, जिसमें उसने अपने पति को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। 15 अप्रैल 2024 को सेशन कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376(2)(n), 377, 493, 495 और 506 समेत कई गंभीर धाराओं से बरी कर दिया। आरोपी को केवल धारा 323/325 (गंभीर चोट पहुँचाने) के तहत मुकदमे के लिए जिम्मेदार पाया गया। इस फैसले के खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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