दिल्ली को स्लम फ्री बनाने के उद्देश्य से Delhi Urban Shelter Improvement Board (डूसिब) झुग्गी पुनर्वास के लिए नई पॉलिसी तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत अलग-अलग शहरों में अपनाए गए सफल मॉडलों का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि राजधानी में प्रभावी पुनर्वास योजना लागू की जा सके। अधिकारियों के मुताबिक, गुजरात के गुजरात और सूरत में झुग्गी बस्तियों के पुनर्वास के लिए अपनाए गए मॉडल की भी स्टडी की जा रही है। इन शहरों में स्लम रिहैबिलिटेशन के लिए लागू की गई योजनाओं को सफल माना जाता है, इसलिए दिल्ली में भी ऐसे मॉडलों को अपनाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।

इसके अलावा मुंबई  में एशिया के सबसे बड़े स्लम एरिया के पुनर्वास के लिए बनाई गई Slum Rehabilitation Authority (एसआरए) की पॉलिसी का भी अध्ययन किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि इन मॉडलों से सीख लेकर दिल्ली में झुग्गीवासियों के पुनर्वास के लिए बेहतर और टिकाऊ नीति तैयार की जा सकती है।

राजधानी में फिलहाल करीब 675 झुग्गी बस्तियां हैं, जिनमें लाखों लोग रहते हैं। अधिकारियों के मुताबिक प्रस्तावित पॉलिसी के तहत जिस निजी एजेंसी को हाई-राइज ईडब्ल्यूएस (Economically Weaker Section) फ्लैट बनाने का काम दिया जाएगा, उसी एजेंसी को झुग्गीवासियों के लिए ट्रांजिट कैंप भी तैयार करने होंगे। इन ट्रांजिट कैंपों में निर्माण कार्य के दौरान प्रभावित परिवारों को अस्थायी रूप से रखा जाएगा।

यदि किसी इलाके में ट्रांजिट कैंप बनाना संभव नहीं होता है, तो सरकार झुग्गी में रहने वाले परिवारों को फ्लैट मिलने तक हर महीने 5000 रुपये से अधिक किराया देने के विकल्प पर भी विचार कर रही है, ताकि उन्हें अस्थायी आवास मिल सके। जानकारी के अनुसार, राजधानी की सबसे बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक जखीरा इलाके के पास स्थित राखी मार्केट जेजे कैंप को माना जाता है। Zakhira के आसपास फैली यह बस्ती लंबे समय से पुनर्वास योजनाओं के दायरे में रही है।

मुंबई मॉडल की भी स्टडी

दिल्ली को स्लम फ्री बनाने के मकसद से Delhi Urban Shelter Improvement Board (डूसिब) झुग्गी पुनर्वास के लिए नई पॉलिसी तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है। इसके तहत देश के अलग-अलग शहरों में लागू मॉडल का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि राजधानी के लिए बेहतर योजना बनाई जा सके। अधिकारियों के मुताबिक, Dharavi के पुनर्विकास मॉडल का भी अध्ययन किया जा रहा है। इस मॉडल में झुग्गियों में रहने वाले करीब 70 फीसदी लोगों ने खुद कोऑपरेटिव सोसायटी बनाकर हाई-राइज बिल्डिंग निर्माण के लिए प्राइवेट बिल्डर की पहचान की। इस तरीके से पुनर्विकास की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ी और परियोजना को आगे बढ़ाने में आसानी हुई।

डूसिब अधिकारियों का कहना है कि सूरत, अहमदाबाद और मुंबई के मॉडल समेत विभिन्न विकल्पों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। सभी मॉडल का विश्लेषण करने के बाद ही दिल्ली के लिए नई झुग्गी पुनर्वास पॉलिसी तैयार की जाएगी, ताकि झुग्गीवासियों को बेहतर आवास और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।

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