
अफीम
सूबे में अफीम की खेती का मामला बड़ा दिलचस्प है। सात साल तक अफीम उगती रही और किसी को भनक तक नहीं लगी। अब अचानक हुए इस खुलासे से हड़कंप मच गया है। जिस जमीन में अफीम उग रही थी, वह रूलिंग पार्टी के नेता की है। जब मामला फूटा तब पार्टी ने फौरन अपने अफीमची नेता को निलंबित कर दिया। राजनीति में निलंबन भी बड़ा दिलचस्प औज़ार है, जैसे किसी बड़े घाव पर छोटी-सी पट्टी लगा दी जाए और समझ लिया जाए कि इलाज हो गया। दिलचस्प यह भी है कि अब अफीम उगाने वाले नेता की आला नेताओं से नजदीकियां ढूंढी जा रही हैं। हर कोई मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर घूम रहा है। ऐसा लग रहा है कि जैसे अफीम के खेत में अब संबंधों की खुदाई हो रही हो। खैर, यह होना भी चाहिए। यह पता लगना ही चाहिए कि किस-किस नेता और अफसर ने अफीम के पौधे को खाद- पानी देकर सींचा है और किसने दूर खड़े होकर केवल उसके असर का आनंद लिया है। अफीम की खेती कोई धनिया-पुदीना तो है नहीं कि चुपचाप गमले में उग जाए और किसी को खबर भी न हो। कई-कई एकड़ में अफीम उगती रही है। ऐसे में अगर सरकारी व्यवस्था को इसकी मालूमात न हो तो यह आश्चर्य की बात है। यह तो वहीं बात हो गई कि शहर के बीचोंबीच हाथी खड़ा हो और किसी ने उसे देखा ही नहीं। दरअसल अफीम की इस खेती ने एक बड़ा सच उजागर कर दिया है कि हमारी व्यवस्था की नींद बहुत गहरी है। इतनी गहरी कि सात साल तक खेतों में अफीम लहलहाती रही और चौकसी की जिम्मेदारी उठाने वाले लोगों को इसकी भनक तक नहीं लगी। मुमकिन है कि यह अफीम का ही असर रहा होगा। बहरहाल सवाल यह है कि एक स्थानीय नेता आखिर इतना साहस किस बाजार से खरीद लाया कि खुलेआम अफीम की खेती करने लग गया? आम समझ यही कहती है कि जब तक व्यवस्था के बड़े चेहरे मौन सहभागी न बन जाएं, तब तक ऐसा दुस्साहस जुटा पाना आसान नहीं होता। इसलिए जरूरी है कि इस पूरे मामले में सिर्फ खेतों से पौधे ही न उखाड़े जाएं। थोड़ी कुदाल व्यवस्था की जमीन पर भी चलनी चाहिए। क्योंकि अफीम के पौधे उखाड़ देने भर से सच खत्म नहीं होता। सच तो केवल जमीन के भीतर छिपी जड़ों में जिंदा है। एक जरूरी बात यह भी है कि सात साल पहले जब अफीम की खेती शुरू हुई थी, तब सूबे की सत्ता में आज की विपक्षी पार्टी थी और पिछले दो सालों से तब की विपक्षी पार्टी सत्ता में है। यानी इस कहानी में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के हिस्से की जमीन शामिल है। ऐसे में जब इस पूरी व्यवस्था की मजबूत जमीन पर सच की कुदाल चलेगी तभी पता चलेगा कि अफीम की असली जड़ें आखिर कितनी गहरी हैं और वे किस-किस की जमीन से होकर गुजरती हैं। जिले के कलेक्टर-एसी मंझे हुए अफसर हैं। यकीनन बाल की खाल निकाल लेंगे।
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हाय तौबा
एक मंत्री अपने अधीन एक विभाग के डायरेक्टर से हाय-तौबा किए पड़े हैं। डायरेक्टर ऊंची पहुंच वाले हैं। सूबे में जब सत्ता बदली थी, तब वह अपनी कुर्सी बचाने की सिफारिश दिल्ली से ले आए थे। मजाल था कि कोई उनकी कुर्सी हिलाने की जुर्रत कर पाता। खैर, बीते अगस्त में जब मंत्री जी ने शपथ ली थी, तब उन्हें यह यकीन था कि उनके व्यापारिक अनुभव के आधार पर उन्हें कोई ठीक ठाक विभाग मिलेगा। लेकिन हुआ बिल्कुल उलट। मंत्री जी न तो ता-ता-थई-थई जानते थे और न ही उनकी आवाज़ सुर में थी। फिर भी विभाग ऐसा मिला कि वह मन मसोसकर रह गए। मगर काम का जुनून उनमें खूब था। शुरू-शुरू में विभाग को समझने में गहरी रुचि दिखाई। विभाग समझ आया या नहीं, इस सवाल की अहमियत तभी खत्म हो गई, जब उन्हें विभाग का डायरेक्टर ठीक-ठीक समझ आ गया। अब स्थिति यह है कि वह न तो डायरेक्टर को निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। सुना है कि उन्होंने एक-दो बार ऊपर वालों के सामने अर्जी भी लगा दी कि इस बला को टाल दो भईया। आलम यह है कि मंत्री से जब कोई पूछता है कि काम कैसा चल रहा है? मंत्री फट पड़ते हैं। दिल की बात मुंह पर आ जाती है। चुभती सच्चाई यही है कि मंत्री जी चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। असल बात यह है कि डायरेक्टर का बाल भी बांका न कर पाना केवल मंत्री की व्यक्तिगत असफलता नहीं है। यह पूरे तंत्र की कहानी है। जब किसी व्यक्ति की शक्ति, उसकी पहुंच और सिफारिश जुटाने की हिम्मत बढ़ जाती है, तब व्यवस्था की साख पर सवाल उठ खड़ा होता है। कहने भर को यह बात अब जमीन पर सच दिखती है कि कोई मंत्री चाहे तो अपने विभाग में क्या नहीं कर सकता है? हकीकत यह है कि मंत्री के हिस्से केवल सब कुछ देखते रह जाने भर की हिम्मत बची है। इससे इतर कुछ नहीं।
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रुपया
सरकारी दुनिया में उत्साह एक खतरनाक चीज़ है। खासकर तब जब वह अनुमति से बड़ा हो जाए। हाल की ही बात है। एक विभाग के डायरेक्टर साहब पर उत्साह कुछ ऐसा सवार हुआ कि उन्होंने तामझाम से भरा एक बड़ा आयोजन कर डाला। उन्हें लगा कि इस आयोजन से उन्होंने अपनी तरक्की की बड़ी लकीर खींच ली है। उन्हें लगा कि उन्होंने उपलब्धियों का हिमालय खड़ा कर दिया है। आयोजन के बाद जब हिसाब की पोटली खुली तो पता चला कि कार्यक्रम की शोभा जितनी बड़ी थी, बिल भी उतना ही विराट है। तब डायरेक्टर साहब को याद आया कि रुपया तो देना पड़ेगा और रुपया देने की चाबी एक आला अफसर के पास है। डायरेक्टर साहब पूरे आत्मविश्वास से उनके पास पहुंचे। जाहिर है उन्होंने सोचा होगा कि आयोजन इतना सफल रहा है। साहब खुश होंगे। साहब ने फाइल देखी और सीधा सपाट कह डाला, मुझसे पूछकर आयोजन किए थे क्या? डायरेक्टर के सामने संकट उठ खड़ा हुआ। जब उन्हें कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझा तब उन्होंने उनसे ही हाय तौबा करने वाले मंत्री की शरण ले ली। उन्हें सारथी बना लिया। दोनों संग-संग फिर साहब के पास पहुंचे। मंत्री जी ने अपने अंदाज में कहा- साहब, देखिए इसमें कुछ तो करना होगा। साहब अनुभवी थे। वे जानते थे कि नियम भी होते हैं और आग्रह भी। उन्होंने बड़ी नरमी से नियम-कानून की बारीकियां समझा दीं। इतनी बारीकी से कि दोनों को महसूस हो गया कि नियमों की दुनिया में भावना और आग्रह की कोई जगह नहीं। मंत्री जी और डायरेक्टर साहब बाहर आ गए। प्रशासनिक गलियारों में इस बात की खूब चर्चा छिड़ गई। फिलहाल यह तो मालूम नहीं कि डायरेक्टर साहब का काम बना या नहीं, मगर यह तो तय है कि उन्हें एक करारा सबक जरूर मिल गया है।
प्रशासनिक असंतुलन
राज्य पुलिस सेवा के अफसरों का कोई खैरख्वाह नहीं। उन्हें पूछने वाला तो दूर, लगता है कि उनके प्रमोशन के मसले की तरफ कोई झांकना भी नहीं चाहता। सूबे में आईपीएस कैडर के पद सीमित हैं। यह एक वास्तविकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि राज्य पुलिस सेवा के अफसरों के प्रमोशन का रास्ता ही असाधारण रूप से लंबा हो जाए। स्थिति को ऐसे समझिए – राज्य पुलिस सेवा के 2002 बैच के पूरे अफसर भी अभी तक आईपीएस प्रमोट नहीं हो पाए हैं। अगला नंबर 2005 बैच का है, लेकिन दूसरी तरफ राज्य प्रशासनिक सेवा के 2013 बैच के अफसरों के आईएएस बनने की शुरुआत हो चुकी है। कल को यही बैच कलेक्टर बनेगा और 2005 बैच के राज्य पुलिस सेवा के अफसर उन्हें सैल्यूट करेंगे। यह दृश्य प्रशासनिक ढांचे के भीतर समय और अवसर की असमान गति को साफ दिखा रहा है। आज स्थिति यह है कि जहां राज्य प्रशासनिक सेवा से चयनित डिप्टी कलेक्टर लगभग 12–13 वर्षों में आईएएस बन रहे हैं, वहीं राज्य पुलिस सेवा के अफसरों को आईपीएस बनने में 22–23 साल तक इंतजार करना पड़ रहा है। यह केवल आंकड़ों का अंतर भर नहीं है। यह व्यवस्था के भीतर बनते असंतुलन का संकेत भी है। दूसरे राज्यों पर नजर डालें तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। झारखंड में 2010 बैच के राज्य पुलिस सेवा अफसर आईपीएस बन चुके हैं। कर्नाटक में 2012 बैच तक प्रमोशन हो चुका है। गुजरात और केरल में 2011 बैच, आंध्र प्रदेश, सिक्किम और तेलंगाना में 2010 बैच, अरुणाचल प्रदेश में 2009 और पश्चिम बंगाल में 2008 बैच के अफसर आईपीएस प्रमोट हो चुके हैं। दिगर राज्यों के ये उदाहरण बताते हैं कि यह समस्या केवल संरचनात्मक नहीं है, बल्कि नीतिगत प्राथमिकता से भी जुड़ी हुई है। विशेष रूप से तब जब नक्सल चुनौती से जूझते राज्य में आईपीएस कैडर को मजबूत करना प्रशासनिक दृष्टि से भी जरूरी माना जाता रहा है। अतीत में जब कैडर रिव्यू के दौरान पद बढ़ाने का अवसर था, तब उसका पर्याप्त उपयोग नहीं हो सका। कुछ समय पहले राज्य पुलिस सेवा एसोसिएशन ने सुझाव दिया कि आईपीएस कैडर रिव्यू में 60 पद बढ़ाए जाएं। लेकिन पुलिस महकमे ने व्यावहारिकता दिखाते हुए 30 पदों का प्रस्ताव बनाया और फाइल आगे बढ़ा दी। अब सुनने में आता है कि यह फाइल मंत्रालय में आराम फरमा रही है। सरकारी फाइलों की भी अपनी जीवनशैली होती है। वे धीरे चलती हैं और धैर्य से निर्णय का इंतजार करती हैं। मगर यहां राज्य पुलिस सेवा के अफसरों का धैर्य जवाब दे रहा है। राज्य पुलिस सेवा के अफसरों के प्रमोशन में आए इस फासले को मिटाने अब सरकारी पहल जरूरी लगती है। रही बात कैडर रिव्यू की, तो सरकार के पास पर्याप्त दलील है। वैसे भी डबल इंजन की सरकार में सब कुछ मुमकिन लगता है। राज्य पुलिस सेवा के अफसरों के आईपीएस अवार्ड पर लगे ग्रहण को दूर करने सरकार को कुछ उपाय ढूंढना चाहिए। यह मुद्दा केवल प्रमोशन भर का नहीं है। यह मनोबल का भी है। यदि प्रमोशन पाने की प्रतीक्षा ही उनकी नियति बन जाए तो मनोबल पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक है। सरकार के पास विकल्प मौजूद हैं। कैडर रिव्यू एक वैधानिक प्रक्रिया है और परिस्थितियों के अनुसार उसमें संशोधन भी संभव है। यदि प्रशासनिक सेवाओं में संतुलन बनाए रखना है तो इस असमानता की ओर गंभीरता से देखना होगा। क्योंकि कानून व्यवस्था केवल लाठी और वर्दी से नहीं चलती है। ये उस विश्वास से भी चलती है जो वर्दी पहनने वालों के भीतर होता है और यदि वर्दी ही लंबे समय तक अपनी बारी की प्रतीक्षा में खड़ी रह जाए, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि व्यवस्था को संभालने वाले हाथों में पकड़ी लाठी कितनी दृढ़ रह पाएगी।
45 करोड़ का आफर !
राज्यसभा की सीट को लेकर भाजपा और कांग्रेस में नामों पर खूब रस्साकसी चली। कई नामों ने कयासों में ही लंबी छलांग लगाई। भाजपा ने लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा भेजकर कुर्मी वोट बैंक साधने की रणनीति तय की है। पार्टी में कुर्मी नेताओं का कुनबा सिकुड़ रहा है। इसलिए लक्ष्मी वर्मा के नाम के सहारे नए तरीके से वोट बैंक की बीज बुआई की गई है। वहीं कांग्रेस ने फूलोदेवी नेताम को दोबारा राज्यसभा भेजने का फैसला किया है। वह पार्टी की आदिवासी महिला नेता हैं, जो हाईकमान के बेहद करीब हैं। उन्हें इस बार भी चुना गया ताकि आदिवासी समीकरण मजबूत रहे। खासकर उस राज्य में जहां मुख्यमंत्री खुद आदिवासी समाज से आते हैं। फूलोदेवी नेताम को दोबारा राज्यसभा भेजे जाने के फैसले से कांग्रेस के कई नेताओं का सपना चकनाचूर हो गया। बहरहाल इन नामों के तय होने के पहले एक राजनीतिक दल में 45 करोड़ रुपए के प्रस्ताव की खूब चर्चा रही। राजधानी के एक बड़े रियल स्टेट कारोबारी ने 45 करोड़ रुपए देकर राज्यसभा की कुर्सी खरीदने की मंशा जताई थी। मगर लगता है कि राजनीतिक दल की प्राथमिकता पैसे से ज्यादा समाजिक और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करना है। शायद इसलिए ही 45 करोड़ रुपए का आफर भी ठुकरा दिया गया।
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ईनाम
होली पर एक विभाग ने अपने कर्मचारियों को खूब ईनाम बांटा। सुना है कि पांच-पांच हजार रुपए नगद दिए गए। ऐसा नहीं है कि त्यौहार के मौके पर इस तरह से पहली बार ईनाम बांटा गया है, लेकिन इस बार चर्चा बांटी गई रकम को लेकर हो रही है। इससे पहले तक हजार-दो हजार रुपए बांटे जाते रहे हैं। दरअसल कुछ महीनों में विभाग को नया मुखिया मिलना है। इसलिए कहा जा रहा है कि यह एक तरह से नए मुखिया की सॉफ्ट लॉन्चिंग थी। कर्मचारियों ने होली के ईनाम के साथ अपने नए साहब को पहले ही एडवांस में बधाई दे दी है। असल मुद्दा यह है कि ये सब साहब की उदारता का भाव है या आने वाले समय में अपने लोकप्रियता के स्कोर को बढ़ाने का मास्टर स्ट्रोक।
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