Rajasthan Nikay Chunav 2026: राजस्थान में निकाय चुनाव के नामांकन की आखिरी तारीख 31 अगस्त है। यानी प्रत्याशियों के पास अब सिर्फ एक दिन बचा है। इससे पहले टिकट बंटवारे को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों में सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस वॉर रूम में भीलवाड़ा के टिकटों पर चर्चा के दौरान पूर्व मंत्री रामलाल जाट और पूर्व विधायक धीरज गुर्जर के बीच तीखी बहस हो गई।

मामला इतना बढ़ा कि प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली को बीच-बचाव करना पड़ा। दूसरी ओर भाजपा में भी टिकटों को लेकर खींचतान और नेताओं के पाला बदलने का सिलसिला जारी है।
कांग्रेस की बैठक में भिड़े गहलोत-पायलट खेमे के नेता
कांग्रेस में शनिवार शाम भीलवाड़ा के शहरी निकायों के टिकटों को लेकर बैठक चल रही थी। इसी दौरान रामलाल जाट और धीरज गुर्जर के बीच विवाद शुरू हो गया। दोनों नेताओं के बीच काफी देर तक आरोप-प्रत्यारोप हुए। जानकारी के मुताबिक, बहस इतनी बढ़ी कि दोनों ने एक-दूसरे के साथ बैठक तक करने से इनकार कर दिया। विवाद के दौरान रामलाल जाट ने धीरज गुर्जर पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें गुंडा तक कह दिया। इसके बाद धीरज गुर्जर ने भी पलटवार किया और रामलाल जाट के चरित्र पर सवाल उठाए। दोनों के बीच तीखी नोकझोंक काफी देर तक चलती रही। कांग्रेस से जुड़े नेताओं के मुताबिक, बहस के दौरान इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक शब्दों की आवाज बैठक से बाहर तक सुनाई दे रही थी।
डोटासरा और जूली ने कराया मामला शांत
विवाद बढ़ने के बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने दोनों नेताओं के बीच हस्तक्षेप किया। इसके बाद मामला शांत हुआ। रामलाल जाट को पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का समर्थक माना जाता है, जबकि धीरज गुर्जर को सचिन पायलट के करीबी नेताओं में गिना जाता है। भीलवाड़ा की स्थानीय राजनीति में दोनों नेताओं के बीच मतभेद की चर्चा पहले भी होती रही है। निकाय चुनाव में टिकट बंटवारे के दौरान एक बार फिर यह खींचतान सामने आ गई।
90 फीसदी विधानसभा क्षेत्रों में टिकट तय करने का दावा
कांग्रेस की ओर से करीब 90 फीसदी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्याशियों के चयन का काम पूरा होने का दावा किया जा रहा है। पार्टी ने टिकट के लिए जिताऊ और टिकाऊ उम्मीदवारों के फॉर्मूले पर जोर दिया है। साथ ही बगावत रोकने के लिए भी पार्टी स्तर पर रणनीति तैयार की गई है। हालांकि, टिकट वितरण को लेकर नेताओं के बीच सामने आया विवाद बताता है कि नामांकन की आखिरी तारीख से पहले पार्टी के सामने असंतोष को संभालना बड़ी चुनौती है।
BJP में भी नेताओं के पाला बदलने से बढ़ी हलचल
भाजपा में भी निकाय चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अजमेर में पूर्व महापौर धर्मेंद्र गहलोत के इस्तीफे के बीच दौसा के लालसोट से भाजपा को झटका लगा है। भाजपा के पूर्व वाइस चेयरमैन पुरुषोत्तम जोशी और भाजपा नेता दिनेश जोशी ने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। दोनों भाइयों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद लालसोट की स्थानीय चुनावी राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है। पाली में भी भाजपा के पांच बार के पार्षद राकेश भाटी कांग्रेस में शामिल हो गए। नामांकन की आखिरी तारीख से ठीक पहले नेताओं के इस तरह पाला बदलने से दोनों दलों में टिकट और स्थानीय समीकरणों को लेकर हलचल बढ़ गई है।
भाजपा में टिकटों पर महामंथन जारी
भाजपा पिछले तीन दिनों से अलग-अलग संभागों के निकायों के प्रत्याशियों पर मंथन कर रही है। अजमेर, उदयपुर और बीकानेर के बाद कोटा और जोधपुर संभाग के सभी निकायों के लिए प्रत्याशी तय किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब भरतपुर और जयपुर संभाग के प्रत्याशियों के नाम तय किए जाने बाकी हैं। इसी बीच जयपुर नगर निगम के सिविल लाइन क्षेत्र के वार्डों को लेकर भी पार्टी के भीतर चर्चा तेज रही।
16 प्रत्याशियों को माला पहनाने की चर्चा, BJP ने किया इनकार
जयपुर में सिविल लाइन विधायक गोपाल शर्मा को लेकर चर्चा रही कि उन्होंने अपने स्तर पर 16 प्रत्याशियों का चयन कर उन्हें माला पहना दी। इसके बाद पार्टी लाइन से अलग जाकर प्रत्याशी तय करने पर विधायक को कारण बताओ नोटिस दिए जाने की अटकलें भी सामने आईं। हालांकि, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री और प्रदेश निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी ने ऐसे किसी घटनाक्रम से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने अभी किसी प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है। ऐसे में अनुशासनहीनता का सवाल ही नहीं उठता। उनके मुताबिक, किसी को नोटिस जारी नहीं किया गया है और पार्टी में अब तक किसी तरह का विरोध भी सामने नहीं आया है। हरीश द्विवेदी ने दावा किया कि 31 अगस्त को भाजपा के 10 हजार से ज्यादा उम्मीदवार अपना नामांकन दाखिल करेंगे।
अब सिर्फ एक दिन, दोनों दलों के सामने बड़ी चुनौती
राजस्थान निकाय चुनाव में नामांकन की आखिरी तारीख नजदीक आते ही दोनों प्रमुख दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने-अपने खेमे को एकजुट रखने की है। कांग्रेस में टिकट को लेकर वरिष्ठ नेताओं के बीच विवाद सामने आ चुका है, जबकि भाजपा में भी नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटनाएं सामने आई हैं। अब 31 अगस्त को नामांकन खत्म होने के बाद ही साफ होगा कि टिकट से नाराज कितने नेता मैदान में उतरते हैं और दोनों दलों के लिए बगावत कितनी बड़ी चुनौती बनती है।
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