मुंबई के दिंडोशी सेशन कोर्ट ने करीब 12 साल पुराने एक गंभीर POCSO एक्ट में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने इस मामले में आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है. कोर्ट का साफ कहना है कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को ठोस तरीके से साबित नहीं कर पाया, जिसके चलते आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया. यह शख्स पिछले एक दशक से अधिक समय से जेल की सलाखों के पीछे था. कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस की जांच और पीड़िता के बयानों में मौजूद गंभीर खामियों को आधार बनाया है.

मुंबई की दिंडोशी कोर्ट ने नाबालिग से गैंगरेप के आरोपी को 12 साल बाद बरी किया. कोर्ट ने FIR में देरी और मेडिकल साक्ष्यों की कमी को आधार माना.

मुंबई की दिंडोशी सेशंस कोर्ट ने 12 साल पुराने गैंगरेप और POCSO एक्ट के एक मामले में 35 साल के शख्स को बाइज्जत बरी कर दिया. यह शख्स पिछले एक दशक से अधिक समय से जेल की सलाखों के पीछे था. यह केस साल 2014 का है, जब दहिसर पुलिस स्टेशन में एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज कराई थी. आरोप था कि पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति उसकी बच्ची को अपने घर बुलाकर अश्लील वीडियो दिखाता था और उसके साथ गलत हरकतें करता था. परिवार का कहना था कि बच्ची को जान से मारने की धमकी दी गई थी, इसलिए वह लंबे समय तक चुप रही.

कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयानों में गंभीर विसंगतियां थीं, जिन्हें पुलिस और मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड किया था. पीड़िता की सही उम्र भी रिकॉर्ड पर नहीं लाई गई थी. लंबी सुनवाई के बाद कोर्ट ने कई ऐसी बातें नोट कीं, जिनसे केस कमजोर होता गया. उम्र पर ही सच साफ नहीं हो पाया. अभियोजन ने बच्ची की उम्र 11 साल बताई, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट और जन्म प्रमाण पत्र में अलग-अलग तारीखें सामने आईं. कोर्ट ने कहा कि जब उम्र ही साफ नहीं है, तो पॉक्सो की धाराएं साबित करना मुश्किल हो जाता है.

मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता के हाइमन (Hymen) में चोट के निशान पाए गए थे. इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि “सिर्फ हाइमन में चोट के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि शारीरिक संबंध बनाए गए थे.”

पीड़िता, उसकी मां और पुलिस के बयान कई जगह पर अलग-अलग थे. कुछ बातें बाद में जोड़ी गईं, जो पहले रिकॉर्ड में नहीं थीं, इससे कोर्ट ने गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए. मामले में कहा गया था कि आरोपी मोबाइल पर अश्लील वीडियो दिखाते थे, लेकिन जांच एजेंसियां इसका कोई डिजिटल सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकीं.

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