पटना। ओडिशा में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी लाइन से हटकर कदम उठाना अब तीन बागी विधायकों को भारी पड़ने वाला है। कांग्रेस आलाकमान ने कड़ा रुख अपनाते हुए इन विधायकों को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित करने का मन बना लिया है। नेतृत्व ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अनुशासनहीनता और क्रॉस वोटिंग करने वालों के लिए संगठन में कोई जगह नहीं है।
अनुशासन समिति की कार्रवाई
पार्टी ने बागी विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जिसकी दो दिन की समय सीमा समाप्त हो चुकी है। अब तक वाल्मीकिनगर के विधायक सुरेंद्र कुशवाहा और फारबिसगंज के मनोज कुशवाहा ने अपना स्पष्टीकरण प्रदेश कांग्रेस अनुशासन समिति को सौंप दिया है। हालांकि, मनिहारी के विधायक मनोहर प्रसाद सिंह का जवाब आना अभी बाकी है। अनुशासन समिति के अध्यक्ष कपिलदेव प्रसाद यादव ने संकेत दिया है कि तीनों जवाबों की समीक्षा के बाद अंतिम अनुशंसा केंद्रीय कार्यालय को भेज दी जाएगी।
भीतरघात और संगठनात्मक नुकसान
खबरों के मुताबिक, ये तीनों विधायक चुनाव जीतने के बाद से ही पार्टी की गतिविधियों और सांगठनिक बैठकों से दूरी बनाए हुए थे। इनके भाजपा या जदयू में जाने की अटकलों ने पार्टी को इतना कमजोर कर दिया कि कांग्रेस अब तक अपने विधायक दल के नेता का चयन भी नहीं कर पाई। इसका खामियाजा विधानसभा समितियों में भी भुगतना पड़ा है। जहां 5 विधायकों वाली AIMIM को एक समिति का सभापति पद मिल गया, वहीं 6 विधायकों वाली कांग्रेस खाली हाथ रह गई। यदि ये तीन विधायक निष्कासित होते हैं, तो भविष्य में भी कांग्रेस के लिए किसी समिति की अध्यक्षता हासिल करना नामुमकिन हो जाएगा।
विधानसभा में क्या होगी स्थिति?
पार्टी से निकाले जाने के बाद ये तीनों विधायक सदन में असंबद्ध सदस्य के रूप में बैठेंगे। उन पर कांग्रेस का व्हिप लागू नहीं होगा, लेकिन वे आधिकारिक तौर पर किसी अन्य दल में शामिल नहीं हो सकेंगे। दलबदल कानून के तहत पार्टी तोड़ने के लिए दो-तिहाई बहुमत (6 में से 4 विधायक) की आवश्यकता होती है, जो फिलहाल इनके पास नहीं है।
खरीद-फरोख्त का खुलासा
इसी बीच, चनपटिया से कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने एक बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा चुनाव के दौरान उन्हें भी हॉर्स ट्रेडिंग का ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस पार्टी से गद्दारी नहीं कर सकते जिसने उन्हें पहचान दी है।
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