पटना। शहर में महिलाओं के सुरक्षित सफर के लिए शुरू की गई ‘पिंक बस’ सेवा आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। जिन महिला ड्राइवरों के कंधों पर इस सेवा को सफल बनाने की जिम्मेदारी थी, वे आज व्यवस्था की अनदेखी और अधिकारियों की बेरुखी का शिकार हैं। अपनी व्यथा को दुनिया के सामने लाने के लिए इन महिला कर्मियों ने प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सुधा वर्गीज को एक मार्मिक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने 15-15 घंटे की ड्यूटी, मानसिक उत्पीड़न और बुनियादी सुविधाओं के अभाव जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

​हाथ में हुनर, पर स्टीयरिंग से दूरी

​पत्र में महिलाओं ने सबसे बड़ा आरोप यह लगाया है कि वे पूरी तरह प्रशिक्षित हैं और आधिकारिक तौर पर नियुक्त हैं, बावजूद इसके उन्हें बस चलाने नहीं दी जा रही। पिछले 3-4 महीनों से उन्हें ऑफिस में सिर्फ बैठाकर रखा जाता है। उनका कहना है कि “हमें बस चलाने का मौका नहीं मिलता, बस पूरे दिन बिना काम के बैठाए रखा जाता है।” यह स्थिति उनके कौशल और आत्मविश्वास दोनों को चोट पहुंचा रही है।

​15 घंटे की बंधुआ मजदूरी और मानसिक तनाव

​ड्यूटी के घंटों को लेकर भी चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। महिला ड्राइवरों को सुबह 5 से 6 बजे के बीच बुलाया जाता है, जबकि उनकी छुट्टी रात 9:30 से 10 बजे के बीच होती है। दिन भर कार्यस्थल पर मौजूद रहने के बाद भी उन्हें काम नहीं दिया जाता। इतने लंबे समय तक बिना किसी सार्थक कार्य के बंधे रहना उनके लिए भारी मानसिक तनाव का कारण बन रहा है।

​दफ्तर में पानी और वॉशरूम तक नहीं

​जहां एक ओर सरकार महिला गरिमा और ‘स्वच्छ भारत’ का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं पिंक बस की इन महिला कर्मियों के लिए दफ्तर में पीने का पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं। अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए उन्हें हर दिन संघर्ष करना पड़ता है, जो बेहद शर्मनाक है।

​अधिकारियों का दुर्व्यवहार: मदद के बजाय मजाक

​पीड़ित महिलाओं का आरोप है कि जब वे अपनी समस्याओं को लेकर अधिकारियों के पास जाती हैं, तो उन्हें सहानुभूति मिलने के बजाय अपमान झेलना पड़ता है। अधिकारी उनकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय उनका मजाक उड़ाते हैं। इस गरिमाहीन व्यवहार और कार्यस्थल पर बढ़ते मानसिक उत्पीड़न ने इन महिलाओं के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया है। अब उन्हें उम्मीद है कि सुधा वर्गीज के हस्तक्षेप से उन्हें न्याय और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिलेगा।