अजय सैनी, भिवानी। वस्त्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (टीआईटीएस), भिवानी में “एथिकल इंटेलिजेंस 2026: सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के माध्यम से एल्गोरिद्मिक पक्षपात का समाधान” विषय पर एक प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हाइब्रिड मोड (ऑनलाइन एवं ऑफलाइन) में किया गया।
यह सम्मेलन न केवल शैक्षणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में संवाद को सुदृढ़ करने का एक प्रभावी मंच भी बना।
सम्मेलन में देश-विदेश से 150 से अधिक शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया, जबकि 80 से अधिक उच्च-स्तरीय शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।
प्रतिभागियों में यूक्रेन, नाइजीरिया, स्वीडन जैसे देशों के साथ-साथ भारत के विभिन्न राज्य राजस्थान, तमिलनाडु, नागालैंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, हरियाणा एवं नई दिल्ली से विद्वानों की उल्लेखनीय सहभागिता रही। इस विविधतापूर्ण उपस्थिति ने सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।
सम्मेलन को चार तकनीकी सत्रों में व्यवस्थित किया गया, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता(अल एथिक्स), , एल्गोरिद्मिक पूर्वाग्रह (एल्गोरिथमिक बॉयस), मानवीय मूल्य(ह्यूमन वैल्यूज), तथा तकनीकी उत्तरदायित्व(टेक्नोलॉजिकल रिस्पांसिबिलिटी) जैसे समसामयिक एवं महत्वपूर्ण विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
प्रत्येक सत्र में विशेषज्ञों ने अपने शोध निष्कर्षों एवं अनुभवों को साझा करते हुए तकनीक और समाज के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. एम. आर. रवि (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली) ने अपने प्रेरणादायक संबोधन में कहा कि आज के डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विस्तार तीव्र गति से हो रहा है, लेकिन इसके साथ नैतिकता का समावेश उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि एल्गोरिद्मिक पक्षपात को समाप्त करने के लिए वैश्विक स्तर पर समान नैतिक मानकों को अपनाना होगा, जिससे तकनीक मानवता के हित में कार्य कर सके। उन्होंने युवा शोधकर्ताओं को उत्तरदायी एवं संवेदनशील तकनीकी विकास के लिए प्रेरित किया।
मुख्य वक्ता डॉ. कुमार संभवा (निदेशक, उत्तर प्रदेश डिजाइन एवं अनुसंधान संस्थान, नोएडा) ने अपने व्याख्यान में एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि तकनीक में सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों को समाहित किया जाए, तो एक न्यायपूर्ण एवं समावेशी समाज का निर्माण संभव है। उन्होंने डिजाइन थिंकिंग और एथिकल फ्रेमवर्क को भविष्य की तकनीकी विकास प्रक्रिया का आधार बताया।
आमंत्रित वक्ता प्रो. डेसमंड ओकोचा (बिंघम विश्वविद्यालय, नाइजीरिया) ने अपने विचार रखते हुए कहा कि विकासशील देशों में एल्गोरिद्मिक पक्षपात का प्रभाव अधिक गहरा हो सकता है, क्योंकि वहां डेटा विविधता एवं संसाधनों की सीमाएं अधिक होती हैं। उन्होंने समावेशी डेटा संग्रहण एवं स्थानीय संदर्भों को ध्यान में रखते हुए तकनीक विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

वहीं प्रो. ओल्गा परास्का (ख्मेल्नित्स्की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, यूक्रेन) ने अपने संबोधन में कहा कि भविष्य की तकनीक वही होगी, जो मानवीय मूल्यों पर आधारित होगी। उन्होंने कहा कि नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता ही सामाजिक समानता, न्याय और स्थायित्व सुनिश्चित कर सकती है।
कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के निदेशक प्रो. बी. के. बेहरा के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन को ज्ञान-साझा एवं वैश्विक सहयोग का एक सशक्त मंच बताया।
सम्मेलन संयोजक डॉ. अनु कथूरिया ने सम्मेलन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य तकनीकी प्रगति के साथ-साथ नैतिक मूल्यों के समावेश को बढ़ावा देना है, ताकि भविष्य की तकनीक अधिक जिम्मेदार एवं मानवीय बन सके।
कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. मनोज नंदा ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, शोधकर्ताओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त किया और भविष्य में भी इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजनों को निरंतर जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया।
सम्मेलन के समापन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. सतीश आर्य (सेवानिवृत्त डीन, चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय, भिवानी) ने कहा कि शोध एवं नवाचार तभी सार्थक होते हैं, जब वे समाज के कल्याण में सकारात्मक योगदान दें। इस अवसर पर उत्कृष्ट शोध-पत्र प्रस्तुत करने वाले प्रतिभागियों को “सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
इस सफल आयोजन में डॉ. सुनील, डॉ. संचिता, डॉ. लीमा, डॉ. जस्मीत, डॉ. ऋतेश रावत, डॉ. मुकेश, डॉ. आशीष, डॉ. अनिल यादव, डॉ. नगेंद्र, डॉ. अखिल कौशिक, डॉ. अमित मधु तथा डॉ. अजीत सहित समस्त टीआईटी एस परिवार के सदस्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
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