हेमंत शर्मा, इंदौर। मध्यप्रदेश में परिवहन चेक पोस्ट दोबारा शुरू करने के आदेश के खिलाफ अब ट्रांसपोर्ट संगठन खुलकर सामने आ गए हैं। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस और इंदौर ट्रक ऑपरेटर एंड ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन ने ऐलान किया है कि वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए उच्च न्यायालय की डबल बेंच में रिवीजन पिटीशन दायर करेंगे। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 1 जुलाई 2024 को चेक पोस्ट बंद करने का फैसला ‘सुशासन’ और पारदर्शी व्यवस्था की दिशा में एक बड़ा और प्रभावी कदम था। अब यदि चेक पोस्ट दोबारा शुरू होते हैं तो इससे फिर वही पुरानी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी।
भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का आरोप
ट्रांसपोर्ट संगठनों ने साफ तौर पर कहा है कि चेक पोस्ट पहले भ्रष्टाचार के केंद्र बन चुके थे। यहां वाहनों की जांच के नाम पर अवैध वसूली की शिकायतें लगातार सामने आती थीं। संगठन का दावा है कि चेक पोस्ट बंद होने के बाद परिवहन व्यवस्था में पारदर्शिता आई और ट्रांसपोर्टरों को राहत मिली।
ड्राइवरों का उत्पीड़न और जाम की समस्या
संगठनों ने यह भी कहा कि चेक पोस्ट के समय घंटों लंबा जाम लगता था। ट्रक चालकों को बेवजह रोककर रखा जाता था, जिससे उनका समय बर्बाद होता था और उन्हें मानसिक व शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। चेक पोस्ट हटने के बाद स्थिति में सुधार हुआ था, जिसे अब फिर बिगाड़ने की कोशिश हो रही है।
कोर्ट में पेश करेंगे सबूत
ट्रांसपोर्ट संगठनों ने दावा किया है कि वे उच्च न्यायालय में अवैध वसूली और भ्रष्टाचार से जुड़े ठोस साक्ष्य पेश करेंगे। इसमें एक परिवहन सिपाही के पास से करोड़ों की संपत्ति, 52 किलो सोना और 250 किलो चांदी मिलने का मामला भी शामिल है। इसके अलावा लोकायुक्त की कार्रवाई और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अवैध वसूली को लेकर लिखे गए पत्र का भी हवाला दिया जाएगा।
तकनीक से नियंत्रण, चेक पोस्ट की जरूरत नहीं
संगठन का कहना है कि अब केंद्र सरकार के MoRTH नियमों के तहत टोल प्लाजा पर ऑटोमेटिक वेट मशीन और ओवरलोडिंग पर सख्त पेनाल्टी का प्रावधान लागू हो रहा है। ऐसे में ओवरलोडिंग रोकने के लिए चेक पोस्ट की जरूरत नहीं है और इन्हें दोबारा शुरू करना पूरी तरह से अव्यवहारिक है।
मुख्यमंत्री के विजन को बनाए रखने की बात
AIMTC और ITOTA ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश’ के विजन को बनाए रखना है। साथ ही लाखों ट्रक चालकों और ट्रांसपोर्टरों के हितों की रक्षा करना भी उनकी प्राथमिकता है।अब यह मामला कानूनी लड़ाई की ओर बढ़ चुका है। एक तरफ उच्च न्यायालय का आदेश है, तो दूसरी ओर ट्रांसपोर्ट संगठनों का विरोध। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कोर्ट इस मुद्दे पर क्या फैसला लेता है और प्रदेश की परिवहन व्यवस्था किस दिशा में जाती है।

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