पवन राय, मंडला। मध्य प्रदेश के मंडला में पोषण आहार तैयार करने वाले फैक्ट्री बंद हो गई। जिससे न सिर्फ सैकड़ों घरों में जल रहे चूल्हे बुझ गए। बल्कि कुपोषण की लड़ाई लड़ने वाला हथियार भी थम गया। 

मंडला का पोषण आहार संयंत्र जो कभी कुपोषण के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना जाता था आज महीनों से बंद पड़ा है। इस बंद ताले ने सिर्फ मशीनों को नहीं रोका बल्कि सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों की जिंदगी की रफ्तार भी थाम दी है। ये वही संयंत्र है जिसका मकसद आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए गर्भवती महिलाओं और 6 माह से 3 साल तक के बच्चों को रेडी टू ईट पोषण आहार पहुंचाना था। 

एक ऐसा मिशन जो सीधे आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य से जुड़ा है लेकिन जमीनी हकीकत इसके इतर है। जहां एक तरफ कुपोषण से लड़ने की बातें होती हैं

वहीं दूसरी तरफ उसी लड़ाई का सबसे मजबूत सिस्टम आज खुद ठप पड़ा है। मंडला की ये फैक्ट्री सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं थी, बल्कि आसपास के करीब 9 जिलों तक पोषण आहार सप्लाई करती थी। 

इसकी जिम्मेदारी स्व-सहायता समूहों को दी गई थी और इन्हीं समूहों से जुड़ी सैकड़ों महिलाएं पिछले 6-7 सालों से यहां काम कर रही थीं। इन महिलाओं के लिए ये सिर्फ नौकरी नहीं थी। ये आत्मनिर्भरता का जरिया था और उनके परिवार का सहारा था। लेकिन अब वही सहारा छिनता नजर आ रहा है। 

संयंत्र बंद होने के बाद हालात ये हैं कि घर चलाना मुश्किल हो गया है दैनिक जरूरतें पूरी करना चुनौती बन गई हैं। जिन हाथों से पोषण तैयार होता था आज वही हाथ काम के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या कुपोषण से लड़ने की योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी ? आखिर कौन सी वजह है जिसने इतने बड़े और संवेदनशील संयंत्र को बंद होने पर मजबूर कर दिया?

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