अनिल शर्मा , अंबाला। प्रशासनिक फाइलों में नियम जितने सख्त दिखाई देते हैं, जमीन पर उनकी पालना उतनी ही लचर नजर आती है। अंबाला जिला प्रशासन द्वारा किशोर न्याय अधिनियम-2015 के तहत बाल देखभाल संस्थानों के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने का हालिया निर्देश इसी विरोधाभास को उजागर करता है। एक ओर प्रशासन बिना पंजीकरण बच्चों को आश्रय देने वाली संस्थाओं पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उगाला स्थित एक अकादमी में सुरक्षा मानकों की खुली अनदेखी ने सरकारी निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


कहाँ है चूक?
उपायुक्त अजय सिंह तोमर की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में स्पष्ट किया गया कि कोई भी धार्मिक संस्थान या गैर-सरकारी संगठन बिना पंजीकरण बच्चों को नहीं रख सकेगा। जिला बाल संरक्षण अधिकारी ममता रानी ने इसे दंडनीय अपराध बताते हुए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। कागजों पर यह कदम प्रभावी प्रतीत होता है, लेकिन उगाला अकादमी का मामला यह साबित करता है कि चुनौती केवल पंजीकरण की नहीं, बल्कि नियमन और निरंतर निगरानी की भी है।


अकादमी से 4 से 9 वर्ष की तीन मासूम बच्चियों का खिड़की की ग्रिल तोड़कर भाग निकलना केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस सुरक्षा तंत्र की विफलता है, जिसे जिला प्रशासन अनिवार्य बता रहा है। बच्चियां बदहवास हालत में स्थानीय प्रतिनिधि को मिलीं, तब जाकर व्यवस्था की नींद टूटी।


जांच में उजागर हुईं गंभीर खामियां
डीएसपी बराड़ा सुरेश कौशिक की जांच रिपोर्ट ने उस कड़वी सच्चाई को सामने रखा, जिसे अक्सर प्रशासनिक दौरों में नजरअंदाज कर दिया जाता है। जांच में पाया गया कि संस्थान के सीसीटीवी कैमरे बंद थे। आधुनिक सुरक्षा मानकों में तकनीकी निगरानी को सुरक्षा की पहली दीवार माना जाता है, लेकिन यहां यह दीवार पहले ही ढह चुकी थी।
इससे भी अधिक चिंताजनक पहलू बच्चियों द्वारा लगाए गए प्रताड़ना और भूख से जुड़े आरोप हैं। कानून कहता है कि इन संस्थानों में बच्चों को “पारिवारिक परिवेश” मिलना चाहिए, लेकिन यदि मासूमों को ग्रिल तोड़कर अंधेरे में भागने के लिए मजबूर होना पड़े, तो यह स्पष्ट संकेत है कि वहां का माहौल संरक्षण केंद्र से अधिक यातना गृह जैसा बन चुका था।


जवाबदेही की प्रतीक्षा
बाल कल्याण समिति की राज्य चेयरपर्सन रंजीता मेहता ने विभाग की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि बच्चियों की काउंसलिंग की गई है और औचक निरीक्षण किए जाते हैं। लेकिन अनुभव यह बताता है कि “काउंसलिंग” और “प्रतिबद्धता” जैसे शब्द तब तक खोखले हैं, जब तक चूक करने वाले संस्थानों पर कठोर और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होती।


उठते अहम सवाल

0 डीएसपी की रिपोर्ट में अनियमितताएं उजागर होने के बावजूद ठोस कार्रवाई में देरी क्यों?

0 यदि औचक निरीक्षण नियमित होते, तो बंद कैमरों और टूटी ग्रिलों की जानकारी पहले क्यों नहीं मिली?

0 क्या बाल संरक्षण विभाग के पास पर्याप्त संसाधन और मैनपावर है, ताकि जिले के हर पंजीकृत संस्थान की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सके?

अंबाला प्रशासन के लिए यह अब केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की लड़ाई बन चुकी है। जब तक “चेक एंड बैलेंस” की व्यवस्था पारदर्शी और प्रभावी नहीं होगी, तब तक पंजीकरण की अनिवार्यता महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी। असली चुनौती उन बंद कैमरों और बंद कमरों के पीछे छिपी अव्यवस्था को स्थायी रूप से खत्म करने की है, ताकि भविष्य में किसी भी मासूम को सुरक्षा के नाम पर कैद और प्रताड़ना का सामना न करना पड़े।