राकेश चतुर्वेदी, डिंडौरी। मध्य प्रदेश का डिंडौरी विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों सरकारी धन के उपयोग और उस पर होने वाली ‘ब्रांडिंग’ को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। कांग्रेस के कद्दावर नेता और विधायक ओंकार सिंह मरकाम द्वारा बांटी गई स्टडी डेस्क अब विवाद का केंद्र बन गई हैं। विधायक ने अपने क्षेत्र के 23 शिक्षण संस्थानों में करीब 1000 डेस्क वितरित की हैं। इन डेस्कों की खास बात यह है कि इन पर महापुरुषों के चित्र तो लगे ही हैं, लेकिन साथ में विधायक ओंकार सिंह मरकाम का नाम भी प्रमुखता से अंकित है। इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब जिला पंचायत अध्यक्ष रुद्रेश परस्ते ने विधायक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। परस्ते ने कहा, “विधायक महोदय को शिक्षा के मंदिर में अपना व्यक्तिगत प्रचार करने का बड़ा शौक है। सरकारी पैसे से खरीदी गई सामग्री पर महापुरुषों के साथ अपना नाम लिखवाकर उन्होंने राजनीति की एक गलत परंपरा शुरू की है।”

जिले की प्रभारी मंत्री प्रतिमा बागरी ने भी इस पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “सरकारी निधि का उपयोग व्यक्तिगत नाम को चमकाने के लिए नहीं होना चाहिए।” उन्होंने मौके पर ही जिला कलेक्टर को इस पूरे मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं कि आखिर सांख्यिकी विभाग से इन नामों को छापने की अनुमति कैसे मिली || विधायक मरकाम का पलटवार: “भाजपा का प्रायोजित हमला”

इन आरोपों पर विधायक ओंकार सिंह मरकाम ने तीखा पलटवार किया है। उन्होंने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा, “ये पूरी तरह से राजनैतिक आरोप हैं, जो सत्ताधारी दल भाजपा द्वारा प्रायोजित हैं। भाजपा मेरे जनसेवा के कार्यों से घबरा गई है।” ओमकार मरकाम का कहना है कि उनके पास विभिन्न शिक्षण संस्थानों से डिमांड आई थी तो उन्होंने जनहित में फैसला लेते हुए अपनी विधायक निधि से यह डेस्क दिए हैं और यह एक अच्छा कार्य है जिसकी तारीफ होनी चाहिए

उन्होंने सफाई दी कि, “खरीद प्रक्रिया GEM पोर्टल के जरिए पारदर्शी तरीके से हुई है। जब सरकारी भवनों और शिलान्यास के पत्थरों पर मंत्रियों के नाम लिखे जा सकते हैं, तो छात्रों की सुविधा के लिए दी गई सामग्री पर नाम होने में क्या गलत है?” करोड़ों का बजट और आम चर्चा तथ्यों के अनुसार, इन 1000 डेस्क की कुल लागत ₹2,49,19,805/- है, जिसमें एक सेट की कीमत ₹23,650/- आंकी गई है।

आम चर्चा यह है कि 2028 के विधानसभा चुनाव और आगामी पंचायत चुनावों को देखते हुए, युवाओं (फर्स्ट टाइम वोटर्स) को टारगेट करने के लिए यह एक सोची-समझी चुनावी रणनीति हो सकती है। लोग इसे जनहित में बांटा गया सामान कम और ‘चुनावी निवेश’ ज्यादा मान रहे हैं। अब देखना यह होगा कि प्रभारी मंत्री के निर्देश के बाद कलेक्टर की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या इन डेस्कों पर दर्ज ‘माननीय’ का नाम बरकरार रहता है या प्रशासन इस पर कोई कार्रवाई करता है।

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