अमित पवार, बैतूल। मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में वर्षों से चली आ रही एक परंपरा को देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। अपने शरीर के दोनों ओर लोहे की मोटी नुकीली सुई से धागा पिरो कर दो नाड़ो के बीच करते हैं नृत्य। अनोखी दिल दहला देने वाली परंपरा का निर्वहन आज भी ग्रामीण खुशी खुशी कर रहे है। चैत्र महीने में पांच दिवसीय चलने वाला यह नाडा गाड़ा का आयोजन बैतूल जिले के कई गांवों में आज भी पूरे विधि विधान से किया जाता है। इसके पीछे ग्रामीणों की मान्यता है कि बच्चों में होने वाले माता के प्रकोप जिसे मेडिलक साइंस में चेचक बीमारी कहा जाता है,उसके प्रकोप से बचने और ठीक होने के लिए ग्रामीण माता से मन्नत मांगते हैं और जब मन्नत पूरी होने पर माता को खुश करने के लिए रोंगटे खड़े कर देने वाले इस आयोजन को ग्रामीण करते है।
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बैतूल जिले में आठनेर ब्लॉक के धामनगांव में यह आयोजन हुआ। पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में जिन ग्रामीणों की मन्नत पूरी होती है वे गांव में माता के मंदिरों में पूरे विधि विधान से पांच दिनों तक पूजा अर्चना करते है और अंतिम दिन नाडा गाड़ा का आयोजन किया जाता है, जिसमें जिन लोगों की मन्नते पूरी होती है उनके शरीर दोनों साइड नाडा पिरोते है और नाड़ो के बीच चलते है। इस दौरान दो लोग हल्दी और घी शरीर के उस जगह पर लगाते रहते है जहां नाडा पिरोया जाता है। शाम को एक साथ कई बैल गाड़ी को बांधकर उसे ग्रामीण खींचते है। देखने में किसी सजा जैसे लगने वाली इस परंपरा को चिकित्सा विज्ञान कुरीति मानता है।
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जो ग्रामीण नाडा गाड़ा खींचते हैं उनकी माने तो धामनगांव में पांच सौ सालों से यह परंपरा ग्रामीण पूरा करते आ रहे हैं जिसमें शरीर में सुई और धागा पिरोने पर उन्हें कोई दर्द या इन्फेक्शन नहीं होता है। ऐसे भक्तों पर माता की विशेष कृपा होती है जिससे वह यह परंपरा को नाचते गाते पूरा करते है। ग्रामीणों की मान्यता और आस्था इस पर आज भी भारी दिखाई देती हैं। इस आयोजन में सैकड़ों ग्रामीण आस्था में सराबोर होकर गांव की गलियों सामूहिक पारंपरिक नृत्य करते हुए शोभा यात्रा निकालते है। विज्ञान भले ही इसे अंधविश्वास मानती है, लेकिन यह आयोजन गांवों में आस्था के साथ ग्रामीणों में एकजुटता को दिखाता है और भारतीय संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं।
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