रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः।
राजा सर्वस्य लोकस्य देवानाम् इव वासवः॥

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण से उद्धृत इस श्लोक का आश्य है कि भगवान श्री राम धर्म के साकार रूप हैं, वे सज्जन (साधु) हैं, सत्य का पराक्रम रखने वाले (सत्यपराक्रमी) हैं और समस्त लोकों के उसी प्रकार राजा हैं जैसे देवराज इंद्र समस्त देवताओं के राजा हैं।

दशहरा भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है जो हमें सत्य की शक्ति, धर्म की प्रतिष्ठा और अधर्म के विनाश का संदेश है। यह तो सभी जानते हैं कि विजयादशमी, रावण के पुतले को जलाने के साथ अपने भीतर छिपे अहंकार, क्रोध, लोभ, छल, ईर्ष्या और अन्य बुराइयों को पहचानने का अवसर भी है। आज प्रश्न यह है कि क्या दशहरे का वास्तविक संदेश हमारे जीवन में उतर पा रहा है या अब यह केवल विशाल पुतलों, आतिशबाजी और मनोरंजन की झांकी बन के रह गया है?

कुछ दशक पहले तक विजयादशमी के अवसर पर देशभर में रामलीलाओं का मंचन हुआ करता था। यही रामलीला समाज के सांस्कृतिक जीवन का प्रमुख आकर्षण हुआ करती थी। लोग कई -कई दिनों तक चलने वाले रामलीला के मंचन को पूरे मनोयोग से देखते थे। कलाकारों के संवाद, उनके अभिनय और उनके द्वारा प्रस्तुत आदर्श चरित्र दर्शकों के मन पर ऐसी छाप छोड़ते थे कि वर्षों बाद भी वे संवाद स्मृतियों में जीवित रहते थे। रामलीला के राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और भरत जैसे पात्र मंच से परे लोगों के जीवन में प्रेरणा बनकर उतरते थे।

स्थानीय लोगों की सहभागिता रामलीला को सामाजिक उत्सव का स्वरूप देने का काम करती थी। नगर, गांव, मोहल्ले के किसी घर का व्यक्ति राम बनता, कोई लक्ष्मण की भूमिका निभाता और कोई हनुमान का चरित्र जीवंत करता। बाहर से आने वाली रामलीला मंडलियाँ भी अपनी कला और संवादों से वातावरण को लगभग 10 दिनों तक भक्तिमय बनाए रखती थीं। रामलीला केवल अभिनय नहीं हुआ करता था वह समाज की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक एकता और संस्कारों का जीवंत प्रदर्शन भी था।

समय के बदलते परिदृश्य में आज सब कुछ बदल गया है। आधुनिक तकनीक, आकर्षक मंच सज्जा, तेज संगीत और रंगीन आतिशबाज़ीयों ने सभी उत्सवों का स्वरूप बदल दिया है। विजयादशमी में अब दर्शकों का ध्यान राम के विराट चरित्र से हटकर रावण के पुतले की ऊँचाई, आतिशबाजी की भव्यता और आयोजन की चमक-दमक पर अधिक रहने लगा है। रामलीला के संवाद और श्रीराम के चरित्र से मिलने वाली सीख उपेक्षित रह जा रही है। कहीं-कहीं आधुनिक मनोरंजन की होड़ इतनी बड़ी हो जाती है कि कार्यक्रम में ऐसे गीतों और संवादों को भी शामिल कर लिया जाता है जो रामलीला की मर्यादा और उसकी मूल भावना से मेल नहीं खाते।

आधुनिकता का विरोध करना न इस समस्या का समाधान और न ही हमारा उद्देश्य। प्रचलित AI तकनीक का उपयोग रामलीला को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए किया जा सकता है लेकिन उसकी आत्मा से समझौता नहीं होना चाहिए। निःसंदेह आज AI के माध्यम से संवाद, दृश्य और प्रस्तुतियाँ तैयार करना संभव है फिर भी तकनीक से निर्मित सामग्री तभी सार्थक होगी जब उसमें मानवीय संवेदना, सांस्कृतिक समझ और चरित्रों की गरिमा का ध्यान रखा जाए। श्रीराम का जीवन केवल कुछ संवादों का संग्रह नहीं है उसमें त्याग, सत्य, कर्तव्य, करुणा और मर्यादा का व्यापक दर्शन भी है।

दशहरे का सबसे बड़ा संदेश रावण के पुतले के दहन के बाद शुरू होता है। जब मैदान में आग की लपटें उठती हैं, तो कुछ क्षणों के लिए पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता है। लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद क्या हम अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करने का संकल्प लेते हैं? क्या हम अपने व्यवहार में सत्य को स्थान देते हैं? क्या हम दूसरों के अधिकारों का सम्मान करते हैं? क्या हम परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझते हैं? यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे जीवन में दिखाई नहीं देते, तो रावण दहन का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

धार्मिक आस्था के अलावा भारतीय त्योहारों में जीवन को बेहतर बनाने वाली सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि भी छिपी होती है। दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन की अनूठी परंपरा हो या सोनपत्ती का आदान-प्रदान, इनके ज़रिए परम्परागत रूप से प्रकृति, शुभता और परस्पर सद्भाव से जुड़ने की भावना व्यक्त होती रही है। सोनपत्ती या शमी के पौधे को स्वर्ण के प्रतीक के रूप में स्वीकार करना यह बताता है कि भारतीय संस्कृति में मूल्य केवल वस्तु की कीमत से निर्धारित नहीं होते बल्कि भावना, संबंध और परंपरा भी उन्हें अनमोल बनाते हैं।

बड़ों के चरण स्पर्श करना, छोटों को स्नेहपूर्वक आशीष देना और परस्पर शुभकामनाएँ बाँटना सदा से हमारी सांस्कृतिक विरासत की सुंदर अभिव्यक्तियाँ रही हैं। ये परंपराएँ हमें विनम्रता, सम्मान, आत्मीयता और पारिवारिक जुड़ाव का पाठ पढ़ाती हैं। वस्तुतः किसी भी त्योहार की सार्थकता इस बात में है कि वो रिश्तों को मजबूत करें और समाज में सद्भाव बढ़ाएँ।

निस्संदेह भारत आधुनिकता को लेकर विश्व के साथ कदमताल करे, विज्ञान और तकनीक में नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करे और वैश्विक विकास में अग्रणी भूमिका निभाए लेकिन विकास की इस यात्रा में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भूल जाना किसी दशा में उचित नहीं होगा।इतिहास साक्षी है, परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं जब नई पीढ़ी उनके अर्थ को समझती है और उन्हें अपने जीवन में अपनाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि यथा सम्भव रामलीला के मंचन को फिर से उसके मूल उद्देश्य से जोड़ा जाए। कलाकारों के संवादों में श्रीराम के आदर्शों की गरिमा हो, आयोजनों में स्थानीय समाज की सहभागिता बढ़े, बच्चों और युवाओं तक रामकथा के जीवनोपयोगी संदेश पहुँचाए जाएँ। रावण के पुतले की ऊँचाई से अधिक महत्त्व उस विचार की ऊँचाई का होना चाहिए जिसके चलते रावण का दहन किया जाता है।

रावण दहन का त्योहार विजयादशमी स्वयं के भीतर छिपी बुराइयों पर विजय पाने की शुरुआत का पावन अवसर है। अपने भीतर के दस दुर्गुणों-काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, छल और अन्याय को चुन-चुनकर समाप्त करने के संकल्प के साथ ही रावण का पुतला जलाना सार्थक होगा। दशहरे की वास्तविक विजय उस दिन होगी जब आतिशबाजी के शोर से अधिक श्रीराम के आदर्शों की आवाज सुनाई दे और जब उत्सव की समाप्ति के बाद भी सत्य, मर्यादा और सदाचार हमारे आचरण में जीवित रहें। रावण को जलाना एक परंपरा है लेकिन अपने भीतर रामत्व को जगाना जीवन की साधना है।

संदीप अखिल, सलाहकार संपादक न्यूज 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/लल्लूराम डॉट कॉम

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