चंडीगढ़। 83 वर्षीय वृद्ध विधवा को 34 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद न्याय मिला है। हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को फैमिली पेंशन और सीमित अवधि का बकाया 6% वार्षिक ब्याज सहित देने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा कि पेंशन कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है और इसका भुगतान न किया जाना निरंतर अन्याय की श्रेणी में आता है। याची बदका देवी के पति रामदास लुधियाना इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट में माली के पद पर कार्यरत थे। 20 जुलाई, 1991 को सेवा के दौरान उनका निधन हो गया।
नियमों के अनुसार बदका देवी फैमिली पेंशन की हकदार थीं। बावजूद इसके 30 वर्ष से भी अधिक समय तक एक भी पेंशन लाभ नहीं मिला। याचिका में कहा गया कि बदका देवी निरक्षर और आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उन्हें सरकारी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने कई बार विभाग के चक्कर लगाए, आवेदन दिए और सभी जरूरी दस्तावेज भी जमा कराए लेकिन न फैमिली पेंशन स्वीकृत हुई और न अन्य लाभ मिले।
सरकार ने दलील दी कि पति की मृत्यु 1991 में हुई थी और याचिका बहुत देरी से दायर की गई है लिहाजा कोई राहत नहीं दी जा सकती। यह भी कहा गया कि आवश्यक कंट्रीब्यूटरी पेंशन फंड जमा नहीं कराया गया था। हालांकि सरकार ने यह भी स्वीकार किया कि 23 दिसंबर 2025 को फैमिली पेंशन स्वीकृत करने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन का दावा एक बार का नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला अधिकार है।

कोर्ट ने टिप्पणी की हर महीने पेंशन न मिलना अपने आप में अन्याय है। पेंशन मामलों में देरी का तकनीकी बहाना स्वीकार्य नहीं है। यह बुजुर्गों के गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका का आधार है। कोर्ट ने माना कि बदका देवी का फैमिली पेंशन का दावा पूरी तरह वैध है और केवल देरी के आधार पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता है।
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