भारत के बाद अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जापान के पीछे पड़ गए हैं। वह जापान पर अमेरिकी चावल के लिए बाजार खोलने का दबाव बना रहे हैं। इस वजह से जापान के मुख्य वार्ताकार रयोसेई अकाजावा ने अमेरिका दौरा रद्द कर दिया है। निक्केई एशिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अकाजावा 28 अगस्त को वॉशिंगटन डीसी का दौरा करने वाले थे, लेकिन ट्रम्प के अमेरिकी चावल खरीदने के दबाव के बाद उन्हें यह यात्रा रद्द करनी पड़ी।
भारत पर भी बनाया था दबाव
अमेरिका ने इसी तरह का दबाव भारत पर भी बनाया था। अमेरिका चाहता था कि भारत उनकी मांसाहारी गायों का दूध खरीदे। साथ ही उनके किसानों के लिए भारत अपना मार्केट ओपन करे। लेकिन भारत ने इससे साफ इनकार कर दिया था। इससे बाद अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिया था, जो बाद में बढ़कर 50% तक पहुंच गया।
अमेरिका के आगे नहीं झुका भारत
जापान की तरह ही अमेरिका भारत में अपने डेयरी प्रोडक्ट्स (जैसे दूध, पनीर, घी आदि) को बेचने की इजाजत मांग रहा है। अमेरिकी कंपनियां दावा करती हैं कि उनका दूध स्वच्छ और गुणवत्ता वाला है और वो भारतीय बाजार में सस्ता भी पड़ सकता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और इस सेक्टर में करोड़ों छोटे किसान लगे हुए हैं। भारत सरकार को डर है कि अगर अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारत में आएंगे, तो वे स्थानीय किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसके अलावा, धार्मिक भावना भी जुड़ी हुई है। भारत में ज्यादातर लोग शुद्ध शाकाहारी दूध उत्पाद चाहते हैं, जबकि अमेरिका में कुछ डेयरी उत्पादों में जानवरों की हड्डियों से बने एंजाइम (जैसे रैनेट) का इस्तेमाल होता है। इसलिए भारत की शर्त है कि कोई भी डेयरी उत्पाद तभी भारत में बिक सकता है जब वह यह प्रमाणित करे कि वह पूरी तरह शाकाहारी स्रोत से बना हो।
अमेरिका से टैरिफ घटने की उम्मीद नहीं, इसलिए यात्रा रद्द
निक्की एशिया के मुताबिक अकाजावा चाहते थे कि उनकी यात्रा से अमेरिका से यह लिखित वादा मिल जाए कि जापानी उत्पादों पर टैरिफ घटेगा, लेकिन जब यह साफ हो गया कि ऐसा नहीं होगा, तो उन्होंने यात्रा रद्द कर दी। कई सरकारी अधिकारियों ने निक्केई एशिया से कहा कि ट्रम्प ने जापान पर दबाव डालकर पहले उससे टैरिफ कम कराया और फिर कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाने की शर्त रखी।
इसके बदले में जापान को उम्मीद थी कि अमेरिका ऑटोमोबाइल पर टैरिफ का बोझ कम करेगा, लेकिन ट्रम्प की तरफ से इसे लेकर कोई ठोस भरोसा नहीं मिला। जापान का कहना है कि अमेरिका का रवैया उसकी घरेलू नीतियों में हस्तक्षेप है। अकाजावा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अभी कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर अधिकारियों के स्तर पर और बातचीत की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जब तक वार्ता आगे बढ़ती रहेगी, वे अमेरिका की यात्रा टाल रहे हैं, लेकिन संभव है कि भविष्य में फिर से जाएं।
दावा- जापान चावल कोटा में 75% बढ़ोतरी पर सहमति दे चुका है
रिपोर्ट के मुताबिक अगर जापान, अमेरिका से चावल की खरीद बढ़ाता है तो इससे उसके किसानों को नुकसान हो सकता है। इससे कृषि समुदाय नाराज भी हो सकता है। इस बीच व्हाइट हाउस ने दावा किया कि जापान ने जुलाई में ही अमेरिकी चावल के आयात कोटा में 75% बढ़ोतरी पर सहमति दे दी थी। बाद में जापान के प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा ने साफ कहा कि उनका देश अमेरिकी दबाव में अपने किसानों के हितों का बलिदान नहीं करेगा।
अमेरिका-जापान को एक दूसरे पर भरोसा नहीं
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान और अमेरिका की बातचीत में मुख्य समस्या एक-दूसरे पर भरोसा न करना है। अमेरिका चाहता है कि जापान अपने 550 अरब डॉलर के इन्वेस्टमेंट के वादे को लिखित समझौते में बदले। वहीं, जापान कह रहा है कि अगर उसे लिखित गारंटी चाहिए तो अमेरिका को भी यह लिखकर देना होगा कि जापानी ऑटो पर 15% टैरिफ तुरंत लागू नहीं होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान और अमेरिका करीबी सहयोगी बने हुए हैं। 1951 में हुई सुरक्षा संधि के तहत अमेरिका जापान की रक्षा की जिम्मेदारी निभाता है, जबकि जापान एशिया में अमेरिकी रणनीतिक उपस्थिति का अहम हिस्सा है।
अमेरिका ने जापान से 148 अरब डॉलर का इम्पोर्ट किया
आर्थिक दृष्टि से भी दोनों देशों के रिश्ते बेहद मजबूत हैं। आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका ने 2024 में जापान से लगभग 148 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि जापान ने अमेरिका से सिर्फ 80 अरब डॉलर का निर्यात किया।
जापान का सबसे बड़ा निर्यात क्षेत्र कार और ऑटो पार्ट्स है, जो अमेरिकी ऑटोमोबाइल बाजार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा रखते हैं। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और एडवांस तकनीक से जुड़े उत्पाद भी जापानी निर्यात का अहम हिस्सा हैं जापान की अर्थव्यवस्था कई मामलों में अमेरिका पर निर्भर है। प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा इसे ‘राष्ट्रीय संकट’ बता चुके हैं। जापान ने अमेरिका पर निर्भरता कम करने की बात कही, लेकिन सैन्य गठबंधन के कारण मजबूरन बातचीत कर रहा है।
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