इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के एक मामले में गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया में गंभीर खामियां मिलने पर दीपक की हिरासत को अवैध करार दिया है. अदालत ने पुलिस अधिकारियों की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए, किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने पर दीपक को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया.
प्रयागराज. एक व्यक्ति को हिरासत में लेने और उसकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया में गंभीर खामियां मिलने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई है. न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने दीपक की हिरासत को अवैध ठहराते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली. अदालत ने निर्देश दिया कि यदि दीपक किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए.
गिरफ्तारी प्रक्रिया पर सवाल
मामला गौतमबुद्ध नगर में दो गुटों के बीच हुई हिंसक घटना से जुड़ा है. पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, दीपक और चार अन्य लोगों को घटना वाले दिन हिरासत में लिया गया था, जबकि लिखित शिकायत के आधार पर प्राथमिकी रात में दर्ज की गई. इसके बाद दीपक की औपचारिक गिरफ्तारी 24 अगस्त की दोपहर दिखाई गई.
अदालत ने घटनाक्रम के आधार पर कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने से पहले ही दीपक को हिरासत में ले लिया गया था. खंडपीठ ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है और पुलिस की कार्यप्रणाली कानून के प्रति अपेक्षित जवाबदेही नहीं दिखाती.
दस्तावेजों में मिलीं खामियां
हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 126 और 130 के तहत निवारक कार्रवाई की निर्धारित प्रक्रिया का भी सही तरीके से पालन नहीं किया. गिरफ्तारी के आधार से जुड़े दस्तावेज में केवल प्राथमिकी और साक्ष्यों का सामान्य उल्लेख था, जबकि गिरफ्तारी के विशिष्ट कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाने चाहिए थे.
जांच अधिकारी अनुज कुमार ने 23 अगस्त की तारीख वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, जबकि उसमें गिरफ्तारी की तारीख 24 अगस्त दर्ज थी. व्यक्तिगत तलाशी और जब्ती से जुड़े दस्तावेजों में भी तारीख संबंधी विसंगतियां मिलीं. अधिकारी ने इन्हें तारीख लिखने में हुई गलतियां बताया, लेकिन अदालत इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुई. खंडपीठ ने कहा कि पांच स्थानों पर तारीखों में गड़बड़ी थी और उन्हें न तो सुधारा गया और न ही संशोधन प्रमाणित किए गए.
निवारक कार्रवाई पर आपत्ति
अदालत ने निवारक कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों में भी कमियां पाईं. बंधपत्र में राशि का कॉलम खाली था और सहायक पुलिस आयुक्त की ओर से उसे स्वीकार या अस्वीकार किए जाने की पुष्टि करने के लिए जरूरी हस्ताक्षर, तारीख और समय दर्ज नहीं थे.
इसके अलावा, बीएनएसएस की धारा 130 के तहत 24 अगस्त को जारी दिखाए गए नोटिस पर सहायक पुलिस आयुक्त-द्वितीय कमलेश कांत के हस्ताक्षर थे, जबकि नोटिस सहायक पुलिस आयुक्त-प्रथम के नाम से जारी बताया गया था. खंडपीठ ने आशंका जताई कि संबंधित दस्तावेज बाद में भरे गए हो सकते हैं. अदालत ने यह भी संदेह व्यक्त किया कि याची से खाली कागज पर हस्ताक्षर कराए गए और जांच अधिकारी ने उन पर प्रतिहस्ताक्षर किए, जबकि गिरफ्तारी के कारण दर्ज करने वाला हिस्सा खाली छोड़ा गया.
पुलिस को कानून पालन की नसीहत
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि घटना के समय तनावपूर्ण माहौल था और मौके पर काफी भीड़ मौजूद थी. सरकार के अनुसार, स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए पुलिस ने सद्भावना में कार्रवाई की थी. हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि तनावपूर्ण परिस्थितियां पुलिस को कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करतीं.
खंडपीठ ने कहा कि हिरासत और गिरफ्तारी से पहले निर्धारित कानूनी सुरक्षा उपाय संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत मिले मौलिक संरक्षण से जुड़े हैं. पुलिस इन प्रावधानों की अनदेखी नहीं कर सकती. अदालत ने मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि दस्तावेजों की जांच के दौरान कानूनी प्रावधानों के अनुपालन की पड़ताल नहीं की गई.
अधिकारियों के प्रशिक्षण पर जोर
अदालत ने सहायक पुलिस आयुक्त कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार की कार्यप्रणाली की आलोचना की और उन्हें बीएनएसएस की प्रक्रिया के प्रति अत्यधिक अनभिज्ञ बताया. खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक से अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए बेहतर मॉड्यूल तैयार करने का अनुरोध किया, ताकि उन्हें नागरिक स्वतंत्रताओं और गिरफ्तारी से पहले अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रिया के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके.
अदालत ने उन मामलों पर भी चिंता जताई, जिनमें संदिग्धों को 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में रखने के बाद छोड़ दिया जाता है. खंडपीठ ने चेतावनी दी कि भविष्य में प्रक्रिया की जानकारी न होने का बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा. अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि कमलेश कांत और अनुज कुमार के प्रति नाराजगी जताने वाली टिप्पणियां उनकी संबंधित सेवा पुस्तिकाओं में दर्ज की जाएं.
अंततः हाईकोर्ट ने दीपक की हिरासत को अवैध ठहराते हुए याचिका स्वीकार कर ली और उन्हें किसी अन्य मामले में वांछित नहीं होने की स्थिति में तत्काल रिहा करने का आदेश दिया.

