ईरान में अमेरिका अब तख्तापलट नहीं करेगा. सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या के बाद व्हाइट हाउस प्रशासन ने अपना प्लान बदल लिया है. रणनीति बदलने की 2 बड़ी वजहें बताई जा रही है. पहली वजह, अमेरिका तख्तापलट के लिए ग्राउंड पर अपने सैनिकों को नहीं उतारना चाहता है. उसे लग रहा है कि अगर जमीन पर सैनिक उतरेंगे, तो उसे ज्यादा नुकसान हो सकता है. अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन से पहले राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह बड़ा झटका साबित हो सकता है. टेलिग्राफ ब्रिटेन के मुताबिक तख्तापलट के लिए कम से कम अमेरिका को ईरान में 10 लाख सैनिक उतारने होंगे.
अमेरिका ने खामेनेई की हत्या के बाद अपना प्लान बदल लिया है. अमेरिका अब ईरान में सीधे तख्तापलट करने के लिए नहीं उतरेगा. ट्रंप प्रशासन पूर्व के राष्ट्रपतियों के किए गए गलतियों से सबक लेते हुए यह फैसला लिया है.
दूसरी वजह ईरान की जनता का समर्थन न होना है. ट्रंप प्रशासन इसलिए फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के आम नागरिकों से सड़क पर उतरने का ऐलान किया है, लेकिन ट्रंप की यह अपील अब तक बेअसर रही है. अमेरिकी आउटलेट एक्सियोस के मुताबिक ट्रंप पुरानी गलतियों को नहीं दोहराना चाहते हैं. पहले इराक, अफगानिस्तान और वेनेजुएला जैसे देशों में तख्तापलट के चक्कर में अमेरिका की किरकिरी हुई थी. उसका उदाहरण निम्न बातों से भी देखने को मिल सकता है.
1. इराक में 2003 में सद्दाम हुसैन सरकार के खिलाफ अमेरिका ने जंग छेड़ा. तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए 2 लाख सैनिक इराक में उतार दिए. 2011 में इराक से अमेरिका को जाना पड़ गया. अब इराक में अमेरिका विरोधी शिया गठबंधन की सरकार बनने जा रही है. स्टेटिका के मुताबिक इराक युद्ध में अमेरिका के 4550 जवान मारे गए.
2. साल 2011 में अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के खिलाफ अमेरिका ने मोर्चा खोला. बमबारी के बूते अफगानिस्तान की सत्ता से अमेरिका तालिबान को हटाने में कामयाब रही, लेकिन 20 साल बाद उसे काबुल से वापस जाना पड़ गया. अमेरिका के काबुल से जाते ही तालिबान की सरकार आ गई. अमेरिकी रक्षा विभाग के मुताबिक तालिबान से युद्ध में उसके 2459 सैनिक मारे गए.
3. अमेरिका ने पिछले महीने वेनेजुएला में तख्तापलट की कोशिश की थी. इसके लिए पहले वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका ने गिरफ्तार किया. हालांकि, अमेरिका का मकसद पूरा नहीं हो पाया. मादुरो की डिप्टी को वेनेजुएला में राष्ट्रपति की कुर्सी मिल गई.
4. 1953 में अमेरिका ने सीआईए की मदद से ईरान में तख्तापलट किया था. तख्तापलट के बाद पहेलवी को सत्ता की बागडोर मिली, लेकिन पहेलवी की सरकार जल्द ही अस्थिर होने लगी. 1979 में इस्लामिक क्रांति की आंधी में पहेलवी की सरकार गिर गई. ऑपरेशन को रोकने के लिए अमेरिका ने पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. इसी वजह से अमेरिका इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है.
वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने राष्ट्रपति को जो रिपोर्ट सौंपी है, उसमें कहा गया है कि ईरान उसके लिए कोई खतरा नहीं है. इसके बावजूद सऊदी अरब और इजराइल के कहने पर अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया. अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव ने ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप पर निशाना साधा है. सचिव के मुताबिक अमेरिका का अब हित बदल गया है. उसका हित अब इजराइल का हित हो गया है.
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