प्रति वर्ष 8 मार्च को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस सिर्फ़ एक औपचारिक उत्सव तो है साथ ही साथ उस सत्य को स्वीकार करने का अवसर भी है कि नारी ही सृष्टि की मूल शक्ति है। “Give to Gain” यानी दान से लाभ” इस थीम के साथ मनाया जा रहा है वर्ष 2026 का महिला दिवस। समय के साथ एक तथ्य सामने आया है कि जब-जब समाज, सरकार और संस्थाएं महिलाओं के विकास में निवेश करती हैं तब-तब उसका लाभ केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरा समाज समृद्ध होता है। भारतीय संस्कृति में नारी को केवल सम्मान ही नहीं बल्कि ‘शक्ति’ के रूप में भी स्वीकार्यता मिली हुई है। भारतीय शास्त्र और पुराण, विशेष रूप से रामचरितमानस में नारी की गरिमा, मर्यादा और महानता को पूरी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया हैं। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने अनेक प्रसंगों के माध्यम से यह बताया है कि नारी, परिवार की धुरी ही नही समाज की आत्मा भी है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर हमें अपनी आध्यात्मिक परंपरा से भी प्रेरणा लेनी चाहिए और यह भी समझना चाहिए कि नारी सम्मान केवल आधुनिक विचार नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की प्राचीन धरोहर भी है।

भारतीय समाज में नारी की भूमिका को समझाने के लिए रामचरितमानस पर्याप्त है इसमें माता सीता, कौशल्या, सुमित्रा, उर्मिला, तारा और शबरी जैसी महान स्त्रियों के चरित्र को नारी करुणा, धैर्य, त्याग और शक्ति के अद्भुत संगम के रूप में प्रस्तुत किया है।रामचरितमानस की एक प्रसिद्ध चौपाई“धीरज धरम मित्र अरु नारी।आपद काल परखिए चारी॥”अर्थात धैर्य, धर्म, मित्र और नारी इन चारों की परीक्षा संकट के समय होती है। यह चौपाई बताती है कि कठिन परिस्थितियों में नारी ही परिवार और समाज को संभालने वाली शक्ति बनती है। पारिवार और समाज में आनी वाली आर्थिक, सामाजिक या भावनात्मक संकट को सबसे पहले घर की स्त्री ही उसे संभालने का प्रयास करती है।

रामचरितमानस में माता सीता का चरित्र नारी के त्याग और धैर्य का अद्भुत उदाहरण है। राजमहल की सुख-सुविधाएं छोड़कर माता सीता ने राम के साथ वनवास का कठिन मार्ग चुना। पत्नी धर्म के अलावा यह नारी के साहस और समर्पण का प्रतीक भी था। महिला दिवस 2026 की थीम वाक्य “दान से लाभ” इसी विचार को मजबूत करती है। दान में सिर्फ़ आर्थिक दान नहीं है बल्कि अवसरों का दान, सम्मान का दान और विश्वास का दान भी शामिल है। जब महिलाएँ शिक्षा प्राप्त कर रही होती हैं या किसी क्षेत्र में नेतृत्व कर रही होती है या जब उनके सपनों को आकर मिल रहा होता है तब वास्तव में वे समाज के भविष्य को मजबूत कर रही होती हैं। हमें याद रखना होगा कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 20वीं सदी के प्रारंभ में महिलाओं के अधिकारों के आंदोलन से हुई थी।

1908 में अमेरिका की कामकाजी महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन किया। आगे चल कर 1911 में यूरोप के कई देशों में पहली बार महिला दिवस मनाया गया।1975 में संयुक्त राष्ट्र ने इसे आधिकारिक मान्यता दी और यह दिन पूरे विश्व में महिलाओं के सम्मान और समानता के लिए मनाया जाने लगा। महिलाएँ जो विज्ञान, राजनीति, शिक्षा, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में योगदान दे रही हैं इस दिन उनका विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है। भारतीय समाज में नारी केवल परिवार की सदस्य होने के साथ ही साथ कि संस्कारों की पहली शिक्षिका भी होती है। मां की गोद को बच्चे की पहली पाठशाला कहते है।रामचरितमानस में माता कौशल्या और सुमित्रा के चरित्र इस बात का प्रमाण बनती है कि आदर्श संतानों के निर्माण में मां की भूमिक महत्वपूर्ण होती है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नारी को देवी स्वरूप माना गया है। माँ दुर्गा साहस की, माता लक्ष्मी समृद्धि की और माँ सरस्वती ज्ञान की प्रतीक हैं। यह धार्मिक प्रतीक संदेश देते हैं कि हर स्त्री के भीतर ये तीनों शक्तियां मौजूद हैं जो घर और करियर दोनों में अपनी मेहनत और प्रतिभा से नए आयाम स्थापित कर रही है। वैश्विक तल पर भी आज की स्त्री केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। वह वैज्ञानिक है, नेता है, शिक्षक है, सैनिक है और समाज सुधारक भी। भारत में अनेक महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अवसर मिलने पर वे हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं।

महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि अभी भी समाज में लैंगिक भेदभाव,शिक्षा में असमानता,महिलाओं के खिलाफ हिंसा,रोजगार के अवसरों की कमी जैसी चुनौतियाँ है जिसे दूर करने के लिए समाज के हर वर्ग को मिलकर प्रयास करना होगा। हमें समझना होगा कि नारी समाज की आधी आबादी नहीं बल्कि समाज की आत्मा है। जिस वक्त समाज महिलाओं को सम्मान, अवसर और सुरक्षा दे रहा होता है वास्तव में उस वक्त स्वयं समाज मजबूत बन रहा होता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस वर्ष 2026 की थीम “दान से लाभ” अत्यंत सार्थक है, क्योंकि महिलाओं के विकास में किया गया निवेश समाज की सबसे बड़ी पूंजी बनकर सामने आती है। भारतीय धर्मग्रंथ रामचरितमानस ने भी करुणा, सम्मान और सहयोग को ही धर्म का सच्चा आधार बताया है। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि महिला दिवस ही नही बल्कि हर दिन नारी सम्मान का उत्सव मनाएंगे।क्योंकि सच भी यही है कि जहां नारी का सम्मान होता है, समाज में वहीं सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।

संदीप अखिल
(सलाहकार संपादक न्यूज़ 24 मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़/ लल्लूराम डॉट कॉम)