रेवाड़ी/दिल्ली: एशियन गेम्स में निशानेबाजी (शूटिंग) में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचने वाले भारतीय शूटर कमलजीत का भारत लौटने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर जोरदार स्वागत किया गया। हरियाणा के गांव सुलखा के रहने वाले कमलजीत ने वर्ष 2019 में एक भीषण सड़क हादसे में पैर टूटने और गंभीर चोट लगने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। हादसे के महज 20 दिन बाद ही उन्होंने बिस्तर पर रहते हुए निशानेबाजी का अभ्यास किया, ट्रायल पास किया और अब देश के लिए एशियन स्तर पर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
2019 का दर्दनाक हादसा, जिसमें चली गई थी 2 सहयात्रियों की जान
वर्ष 2019 में कमलजीत जिस टैंपो से अपने गांव सुलखा से रेवाड़ी कोचिंग के लिए जा रहे थे, वह एक भीषण हादसे का शिकार हो गया था। इस दुर्घटना में टैंपो में सवार दो लोगों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि कमलजीत का पैर गंभीर रूप से टूट गया था। इस भयंकर चोट के बावजूद कमलजीत का निशानेबाजी के प्रति जुनून कम नहीं हुआ और उन्होंने रिकवरी के दौरान ही अपने अभ्यास को जारी रखा।
पैर टूटने के 20 दिन बाद दिया ट्रायल, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा
गंभीर चोट के बाद भी कमलजीत ने हार नहीं मानी और हादसे के केवल 20 दिन बाद ही निशानेबाजी का ट्रायल दिया। वे इस ट्रायल में सफल रहे और इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के दम पर शूटिंग में लगातार शानदार प्रदर्शन किया। राज्य स्तर से शुरुआत कर उन्होंने जूनियर विश्व चैंपियनशिप और विश्व कप स्तर पर पदक जीतकर राष्ट्रीय टीम में अपनी जगह पक्की की और अंततः एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर देश और अपने क्षेत्र का नाम रोशन किया।
चोट के कारण छूटा एथलीट बनने का सपना, चाचा ने दिखाई निशानेबाजी की राह
शुरुआत में कमलजीत का पहला सपना एक एथलीट बनने का था। हालांकि, 2019 के हादसे में लगी गंभीर चोट के कारण उनका एथलेटिक्स का सफर वहीं रुक गया। इसके बाद उनके चाचा शक्ति पाल ने उन्हें निशानेबाजी (शूटिंग) की ओर आने के लिए प्रेरित किया। खेल बदलने के बावजूद उनका आगे बढ़ने का जज्बा कायम रहा और शुरुआत के कुछ ही महीनों में उन्होंने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
सीमित आय और कर्ज के बीच पिता ने नहीं छोड़ा बेटे का साथ
कमलजीत की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके परिवार का बड़ा संघर्ष रहा है। उनके पिता रतीराम एक फैक्ट्री में काम करते हैं और परिवार की आय बेहद सीमित है। 2019 के हादसे के बाद इलाज के भारी खर्च के साथ-साथ निशानेबाजी के महंगे उपकरणों और प्रशिक्षण के लिए परिवार को कर्ज तक लेना पड़ा। आर्थिक तंगी और कर्ज के दबाव के बावजूद परिवार ने कमलजीत के खेल और इलाज में कोई कमी नहीं आने दी और उनके सपने का लगातार समर्थन किया।
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