आशुतोष तिवारी, जगदलपुर. बस्तर दशहरा में जब हजारों हाथ मिलकर विशालकाय रथ को खींचते हैं, तो शायद ही किसी का ध्यान उस रस्सी पर जाता है, जिसके सहारे यह परंपरा आगे बढ़ती है. लेकिन इस रस्सी के पीछे छिपी कहानी बेहद खास है. इसे बनाने में एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे एक साल की तैयारी लगती है. करीब 40 गांवों के ग्रामीण जंगलों से सिहाड़ी के पेड़ की छाल जुटाते हैं और फिर अपने पारंपरिक हुनर से रथ खींचने के लिए विशाल रस्सी तैयार करते हैं. खास बात यह है कि इस रस्सी को बनाने की जिम्मेदारी परजा जाति के लोगों के पास है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं.
रथ खींचने वाली रस्सी के लिए एक साल पहले से तैयारी
दरअसल, बस्तर दशहरा की शुरुआत सावन महीने में अमावस्या के दिन पाट जात्रा रस्म के साथ हो जाती है, लेकिन रथ खींचने के लिए रस्सी तैयार करने की प्रक्रिया करीब एक साल पहले ही शुरू हो जाती है. इस रस्सी को बनाने की जिम्मेदारी परजा जाति के लोगों की है. करीब 40 गांवों के ग्रामीण जंगलों से सिहाड़ी के पेड़ की छाल इकट्ठा करते हैं. इसे सुखाकर सुरक्षित रखा जाता है और दशहरा के समय सभी ग्रामीण करंजी में जुटकर इस छाल से विशाल रस्सी तैयार करते हैं. करीब 120 हाथ लंबी इस रस्सी को तैयार करने में ग्रामीणों की सामूहिक मेहनत और पारंपरिक हुनर शामिल होता है.

बस्तर दशहरा में रस्सी के टुकड़े लेकर जाने की खास मान्यता
जोगी बिठाई रस्म के दूसरे दिन से फूल रथ का निर्माण शुरू होने के साथ ही इस रस्सी का इस्तेमाल किया जाएगा. इसे रथ के दोनों किनारों पर 60-60 हाथ के हिस्से में लगाया जाएगा, ताकि श्रद्धालु मिलकर विशाल रथ को खींच सकें और रथ की परिक्रमा पूरी हो सके. इस परंपरा का एक धार्मिक महत्व भी है.
मान्यता है कि रथ परिक्रमा पूरी होने के बाद लोग रस्सी के छोटे-छोटे अंश दक्षिणा चढ़ाकर अपने साथ ले जाते हैं. लोगों की आस्था है कि इस रस्सी को घर ले जाने से दुख-दर्द दूर होते हैं और सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होती है. यही वजह है कि बस्तर दशहरा में रथ खींचने वाली यह रस्सी केवल एक साधन नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों की परंपरा, सामूहिक श्रम और लोगों की गहरी आस्था का प्रतीक है.
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