उपभोक्ता अदालतों को आम आदमी के लिए त्वरित और सुगम न्याय का मंच माना जाता है, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के दक्षिण-पश्चिमी जिले में यह भरोसा लगातार कमजोर पड़ता दिख रहा है। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि यहां दर्ज मामलों का करीब 57 प्रतिशत अब भी लंबित है।
आधे भी मामले नहीं निपटे
बीते एक साल में दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 7,253 मामले दर्ज हुए, लेकिन इनमें से केवल 3,099 का निपटारा हो सका। तुलनात्मक रूप से, नई दिल्ली जिला सबसे बेहतर प्रदर्शन करता नजर आया। यहां 9,143 मामलों में से 7,612 का निस्तारण हो चुका है। इसका मतलब है कि 83.25% मामलों का निपटारा किया गया, जो साबित करता है कि बेहतर व्यवस्थाओं से उपभोक्ता न्याय प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है।
राज्य उपभोक्ता आयोग की भूमिका भी अहम रही है। आयोग में कुल 30,430 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 24,503 का निपटारा हो चुका है। दक्षिण जिले में 6,006 मामलों में से 4,764 और पश्चिमी जिले में 8,101 मामलों में से 6,275 निपटाए गए, जिससे निपटान की दर क्रमशः 79.32% और 77.45% रही। अधिवक्ता अदिति दराल के अनुसार, लंबित मामलों की सबसे बड़ी वजह व्यवस्थागत खामियां हैं। कई जिलों में जज-जनसंख्या अनुपात असंतुलित होने से न्याय प्रक्रिया में देरी हो रही है।
कंपनियां उठाती हैं निपटारे में देरी का फायदा
उपभोक्ता आयोगों में बैंकिंग, बीमा, रियल एस्टेट, टेलीकॉम, ई-कॉमर्स और अन्य सेवा से जुड़े विवादों की सुनवाई होती है। नियम के अनुसार, इन मामलों का निपटारा 90 दिनों के भीतर होना चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है। उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि इस देरी का सीधा फायदा बड़ी कंपनियों और सेवा प्रदाताओं को हो रहा है, जबकि आम उपभोक्ता परेशान हो रहा है।
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