पुरुषोत्तम पात्र, गरियाबंद। देवभोग ब्लॉक में लाटापारा सहकारी समिति के कर्ता-धर्ताओं ने सहकारी बैंक के नियमों को ताक पर रख 24 लाख का नगद आहरण किया. शिकायत पर जांच करने पहुंचे ऑडिट अफसर ने जांच प्रतिवेदन दिए बगैर ही समिति को क्लीन चिट दे दिया. यह केवल लाटापारा सहकारी समिति की बात नहीं है, देवभोग ब्रांच के अन्य समितियों के आहरण भी सवालों को घेरे में है. शिकायतकर्ता का दावा है कि ऐसे तीन अलग-अलग आहरण के जरिए 40 लाख रुपए से ज्यादा की वित्तीय अनियमितता हुई है.

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देवभोग सहकारी ब्रांच की लाटापारा समिति में धान खरीदी वर्ष 2024-25 के लिए जारी प्रासंगिक एवं सुरक्षा व्यय के मद से 3 मई 2025 को प्रस्ताव पारित कर किया गया नगद आहरण जांच का विषय बन गया है. दरअसल, नगद आहरण के प्रस्ताव में समिति के पांच सदस्यों में से केवल दो तत्कालीन प्रबन्धक और प्राधिकृत अधिकारी के दस्तखत थे, जबकि नियम से शाखा प्रबंधक और सहकारिता विस्तार अधिकारी के भी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर होने थे.

लेकिन आहरण नियम के विपरीत नगद हो रहा था. ऐसे में जवाबदार अफसरों ने अपना कलम नहीं फंसाया, पर मौन सहमति देकर इस आहरण के सहभागी बन गए. समिति में अंदरूनी कलह के चलते प्रस्ताव की प्रति ही बाहर निकल आई. इसी प्रस्ताव की कॉपी के साथ आईटीआई कार्यकर्ता गिरीश जगत ने मामले की शिकायत सहायक पंजीयक महेश्वरी तिवारी के समक्ष 16 सितंबर 2025 को शिकायत की थी.

अफसर ने तत्काल जांच के लिए जिला ऑडिटर पीके वडा को जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया. साहब तीन माह बाद जांच के लिए पहुंचे. शिकायतकर्ता को बुलाए बगैर ही जांच पूरी कर दी. तमाम अनियमिताओं के बावजूद साहब ने सबकुछ सही ठहरा दिया, पर लिखित में उच्चाधिकारियों को प्रतिवेदन देना भी जरूरी नहीं समझा.

मामले में सहायक पंजीयक महेश्वरी तिवारी ने कहा कि इस प्रकरण के प्रतिवेदन अब तक नहीं दिया गया है. पूछती हूं. अगर ब्रांच के अन्य समितियों में भी कोई गड़बड़ी अथवा वित्तीय अनियमितता का मामला होगा तो आवश्यक जांच कराई जाएगी. वहीं जांच की जिम्मेदारी संभालने वाले सहकारिता विभाग के ऑडिटर पीके वडा ने कहा कि शासन ने प्राधिकृत अधिकारी बनाया है. अगर वे दस्तखत कर दिए तो मान्य है. जांच हो गई है, सबकुछ ठीक है. नगद आहरण भी किया का सकता है. जिनका दस्तखत छूटा था, उनसे दस्तखत करा लिया गया है.

40 लाख से ज्यादा की अनियमितता

शिकायतकर्ता गिरीश जगत बताते हैं कि लाटापारा ही नहीं बल्कि झाखरपारा में भी प्रस्ताव में छेड़छाड़ और अन्य जरूरी नियम-शर्तों को पूरा किए बगैर लाखों आहरण किए गए हैं. 24 लाख के अलावा अन्य 40 लाख की भी अनियमितता है. सहकारिता लेन-देन को सूचना के अधिकार के दायरे में नहीं रखा गया है. कई सालों से निर्वाचित बॉडी भी नहीं है, इसलिए छोटे-छोटे कर्मचारियों की कलम फंसाकर यहां लाखों की गड़बड़ी को अंजाम दिया गया है. उच्चस्तरीय जांच किया जाए तो कई चौंकाने वाले मामले सामने आयेंगे.