टुकेश्वर लोधी, आरंग। रायपुर के आरंग जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कठिया में भ्रष्टाचार का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। मनरेगा (MGNREGA), जिसे अब ‘जी राम जी’ (VB-G RAM G) योजना के तौर पर नई पहचान दी जा रही है, उसके नाम पर सरकारी खजाने में सेंधमारी की गई है। योजना के तहत स्वीकृत बकरी शेड का निर्माण धरातल पर केवल खुदाई तक ही सीमित रहा, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में इसे “पूर्ण” दिखाकर 1,70,998 रुपये की राशि डकार ली गई है।


इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला पहलू भुगतान की प्रक्रिया है। मस्टर रोल में मात्र एक मजदूर को केवल 261 रुपये का भुगतान दिखाया गया है। बिना निर्माण कार्य पूरा हुए ही 1,70,998 रुपये का भुगतान ठेकेदार या संबंधित एजेंसी को कर दिया गया। मौके पर निर्माण के नाम पर सिर्फ कुछ फुट गहरे गड्ढे खुदे हुए हैं। सरकारी नियमों के अनुसार, किसी भी निर्माण कार्य का भुगतान एक कड़ी प्रक्रिया से गुजरता है।

जियो टैगिंग : नियमतः कार्य के प्रत्येक चरण (प्रारंभ, मध्य और पूर्ण) की फोटो लोकेशन के साथ अपलोड होना अनिवार्य है। सवाल यह है कि भुगतान के लिए केवल गड्ढों की जगह शेड की फोटो पोर्टल पर कैसे आई होगी?
भौतिक सत्यापन : भुगतान से पहले उप-अभियंता को मौके पर जाकर कार्य का सत्यापन करना होता है। क्या बिना देखे ही रिपोर्ट ओके कर दी गई?
मूल्यांकन : इंजीनियर द्वारा कार्य के मूल्यांकन के बाद ही जनपद स्तर से राशि जारी होती है। यहां शून्य काम पर लाखों का मूल्यांकन कैसे हुआ?

आपको बता दें कि कार्यालय जिला पंचायत रायपुर के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी प्रकोष्ठ द्वारा 23 सितंबर 2025 को बकरी शेड निर्माण के लिए प्रशासकीय स्वीकृति का आदेश जारी हुआ था। इसमें महात्मा गांधी नरेगा अंतर्गत बिहान महिलाओं की आजीविका में वृद्धि के लिए “बकरी पालन” की दिशा में विशेष प्रयास के लिए प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। जिले के विकासखंडों में बकरी पालन करने वाली दीदियों का चयन किया गया है, जिन्हें बकरी पालन के नवीन आयामों से प्रशिक्षित कर आजीविका वृद्धि के लिए सशक्त बनाया जाएगा।
उक्त कार्य के लिए मनरेगा से बकरी शेड इच्छुक हितग्राही को स्वीकृत किया जाना है जिसकी लागत 3.25 रुपये लाख है, जिसमें से 2 लाख रुपये महात्मा गांधी नरेगा से व 1.25 लाख हितग्राहियों (दीदी) द्वारा लगाया जाएगा।
हितग्राहियों को इसकी भनक तक नहीं है कि उनके निर्माण कार्य की राशि का भुगतान हो चुका है। वहीं अधिकारियों और बिचौलियों की मिलीभगत ने ‘विकसित भारत’ के संकल्प को पलीता लगा दिया है।
क्या कहते हैं अधिकारी ?
वहीं इस मामले में आरंग जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभिषेक बनर्जी का कहना है कि लल्लूराम डॉट कॉम के माध्यम से उन्हें इसकी जानकारी हुई है। जिला पंचायत के उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाकर मामले की जांच कराई जाएगी।
जांच का विषय यह भी है कि बिना छत और दीवार बने इंजीनियर ने कार्य पूर्ण होने का प्रमाण पत्र कैसे जारी किया? जनपद पंचायत आरंग के जिम्मेदार अधिकारी इस बड़े भुगतान पर मौन क्यों हैं? क्या जियो टैगिंग की प्रक्रिया में फर्जीवाड़े के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ की मिलीभगत है?
आरंग का यह मामला बानगी है कि कैसे ग्रामीण विकास की योजनाओं में ‘भ्रष्टाचार के दीमक’ लग चुके हैं। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस पर कब तक संज्ञान लेता है और जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की जाती है।
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