Business Desk – Crude Oil Price : कच्चे तेल की कीमतों में पिछले दो दिनों से बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। सोमवार शाम तक कीमतों में तेजी थी, लेकिन मंगलवार, 13 अक्टूबर को शुरुआती कारोबार में गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड 1.21% गिरकर 105.386 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। वहीं, WTI क्रूड की कीमत 1.33% गिरकर 92.491 डॉलर प्रति बैरल रही।

पिछले एक महीने में कच्चे तेल की कीमतों में 8% से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, कीमतें अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर से अब भी काफी ऊपर बनी हुई हैं। इस बीच अमेरिका और रूस के बीच डीजल सप्लाई से जुड़ा समझौता भी चर्चा में है। मंगलवार की गिरावट ने पिछले तीन कारोबारी सत्रों की तेजी को कम कर दिया है।

US-रूस डीजल डील का आकलन कर रहे निवेशक

कच्चे तेल के बाजार में निवेशक इस समय भू-राजनीतिक तनाव के साथ अमेरिका और रूस के बीच डीजल सप्लाई से जुड़े समझौते का भी आकलन कर रहे हैं। बाजार में उम्मीद है कि इस समझौते से ईंधन की आपूर्ति से जुड़ी कुछ दिक्कतें कम हो सकती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, समझौते की शर्तों को पूरा करने के लिए रूस ने 10 अक्टूबर को डीजल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में आंशिक ढील दी। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल की उपलब्धता को लेकर बनी चिंताओं पर असर पड़ सकता है।

ट्रंप के फैसले का अमेरिकी सांसद कर रहे विरोध

अमेरिका और रूस के बीच हुए समझौते को लेकर कुछ अमेरिकी सांसदों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह समझौता अमेरिकी कानूनों के उल्लंघन जैसा हो सकता है।

वहीं, ट्रंप ने इस फैसले को अमेरिका के हित में बताया है। उनका कहना है कि यह कदम तेल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर भी लिखा कि वह हमेशा अमेरिकी लोगों के हित में सही विकल्प चुनते हैं और उनके लिए अमेरिका पहले है।

मिडिल ईस्ट में तनाव अब भी बरकरार

मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं हुआ है। रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरों के बाद क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है। वहीं, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी रूस के खिलाफ बड़े हमले की बात कही है।

अमेरिका पर ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव भी बढ़ रहा है। ऐसे घटनाक्रम तेल की सप्लाई और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। इससे आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में फिर तेजी आने का जोखिम बना हुआ है।

भारत पर क्या असर पड़ सकता है?

कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारत के तेल आयात बिल पर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर आयात की लागत बढ़ सकती है, जबकि कीमतों में गिरावट से कुछ राहत मिल सकती है। रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका पहले भारत पर टैरिफ संबंधी दबाव बना चुका है। ऐसे में अमेरिका और रूस के बीच डीजल सप्लाई से जुड़ा समझौता भी चर्चा का विषय है।

हालांकि, दोनों देशों के बीच इस समझौते का भारत की तेल खरीद और व्यापार पर क्या असर होगा, यह आगे की शर्तों और नीतिगत फैसलों पर निर्भर करेगा। फिलहाल कच्चे तेल की कीमतों की दिशा अमेरिका-रूस समझौते, मिडिल ईस्ट के तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक तेल आपूर्ति से जुड़े घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी।