दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) ने सिविल सेवा परीक्षा 2026 में कुछ दिव्यांग श्रेणियों को आरक्षण से बाहर रखने के मामले पर गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने इस संबंध में दायर याचिका पर केंद्र सरकार और Union Public Service Commission (UPSC) से जवाब तलब किया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ऑटिज्म, मानसिक बीमारी और सीखने की अक्षमता जैसी श्रेणियों के उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है, लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन का लाभ नहीं दिया जाता। याचिकाकर्ता ने इसे दिव्यांगजन अधिकार कानून और संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार और UPSC को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
केंद्र सरकार और UPSC से मांगा जवाब
यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय (Devendra Kumar Upadhyaya) और न्यायमूर्ति तेजस करिया (Tejas Karia) की पीठ ने की। याचिका में ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी से पीड़ित अभ्यर्थियों को सिविल सेवा परीक्षा में आरक्षण से बाहर रखने के प्रावधान को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो मिलती है, लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन का लाभ नहीं दिया जाता, जो उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
4 हफ्ते में दाखिल करना होगा जवाबी हलफनामा
पीठ ने स्पष्ट निर्देश दिए कि दोनों पक्ष चार हफ्ते के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करें। अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार की ओर से जवाब किसी सक्षम अधिकारी द्वारा दाखिल किया जाए और उसमें सभी संबंधित विभागों से परामर्श शामिल हो। साथ ही, Ministry of Social Justice and Empowerment को भी इस मामले में अलग से अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
आरक्षण के लाभ से किया था बाहर
याचिकाकर्ता के अनुसार, दिव्यांगजन अधिकार कानून, 2016 की धारा 34(1)(डी) के तहत आने वाले उम्मीदवार—जैसे ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी को आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिया गया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि इन श्रेणियों के उम्मीदवारों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है, लेकिन उन्हें न तो आरक्षण का लाभ मिलता है और न ही सेवा आवंटन में कोई विशेष प्रावधान दिया जाता है।
क्या दी दलील?
याचिका में तर्क दिया गया है कि ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी से पीड़ित अभ्यर्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है, लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन का लाभ नहीं दिया जाता। इससे यह स्थिति “पूर्ण बहिष्कार” जैसी बन जाती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह व्यवस्था संविधान के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों का उल्लंघन करती है अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार ,अनुच्छेद 15: भेदभाव के निषेध का अधिकार ,अनुच्छेद 16: समान अवसर का अधिकार (सरकारी नौकरियों में) अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार याचिका में कहा गया है कि इन अधिकारों के तहत सभी नागरिकों को समान अवसर मिलना चाहिए, लेकिन वर्तमान व्यवस्था दिव्यांग अभ्यर्थियों के साथ असमान व्यवहार को दर्शाती है।
पूर्ण बहिष्कार मनमाना और अनुचित
याचिकाकर्ता ने कहा है कि दिव्यांगजन अधिकार कानून, 2016 के तहत पात्र श्रेणियों के अभ्यर्थियों को आरक्षण देना अनिवार्य है, लेकिन जारी अधिसूचना इसके विपरीत जाकर उन्हें बाहर कर रही है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सरकार द्वारा जिन पदों को दिव्यांगजनों के लिए उपयुक्त माना गया है, उनमें ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी से जुड़े उम्मीदवार भी शामिल हो सकते हैं। ऐसे में इन श्रेणियों को पूरी तरह बाहर करना मनमाना और अनुचित कदम है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार और UPSC से जवाब तलब किया है। साथ ही, पीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को निर्धारित की है।
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