दिल्ली की एक उपभोक्ता अदालत (Consumer court) ने फूड एग्रीगेटर कंपनी स्विगी (Swiggy) और एक रेस्टोरेंट को ग्राहक को 1 लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। मामला ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पर बुफे की कीमत को गलत तरीके से प्रदर्शित करने से जुड़ा है। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (DCDRC), नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए माना कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म केवल खुद को मध्यस्थ बताकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। आयोग के अनुसार, गलत कीमत को लगातार प्रदर्शित करना सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार की श्रेणी में आता है।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की भी जिम्मेदारी

आयोग ने कहा कि ग्राहक को बुफे की वास्तविक कीमत के बारे में गलत जानकारी दी गई। फैसले में यह भी कहा गया कि कीमत को जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे शिकायतकर्ता को बुफे की असल कीमत को लेकर गुमराह किया गया। आयोग के मुताबिक, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर किसी उत्पाद या सेवा की कीमत प्रदर्शित होने के बाद प्लेटफॉर्म की भी जिम्मेदारी बनती है। वह केवल यह कहकर अपनी जवाबदेही से अलग नहीं हो सकता कि वह संबंधित रेस्टोरेंट और ग्राहक के बीच सिर्फ एक मध्यस्थ है।

बुकिंग के समय 1,500 रुपये दिखा था खर्च

यह आदेश वकील प्रवीण कुमार सिंह की शिकायत पर जारी किया गया। शिकायत के मुताबिक, उन्होंने 7 अप्रैल 2024 को स्विगी डाइनआउट के जरिए केशव पुरम स्थित ‘थेमिस बारबेक्यू हाउस’ में दो लोगों के लिए टेबल बुक की थी। शिकायतकर्ता ने बताया कि बुकिंग के समय स्विगी पर दो लोगों के लिए कुल 1,500 रुपये का खर्च दिखाया गया था। यानी प्रति व्यक्ति बुफे की कीमत 750 रुपये बताई गई थी। इसी जानकारी के आधार पर उन्होंने टेबल बुक की थी। हालांकि, जब शिकायतकर्ता रेस्टोरेंट पहुंचे और वहां खाना खाया, तो उनसे अलग कीमत वसूली गई। शिकायत के अनुसार, रेस्टोरेंट ने शाकाहारी बुफे के लिए प्रति व्यक्ति 1,050 रुपये और मांसाहारी बुफे के लिए प्रति व्यक्ति 1,100 रुपये चार्ज किए।

कोर्ट ने कहा- सही जानकारी दिखाने की जिम्मेदारी स्विगी की

21 सितंबर को जारी अपने आदेश में DCDRC की अध्यक्ष दिव्या ज्योति जयपुरियार की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि स्विगी की जिम्मेदारी थी कि उसके प्लेटफॉर्म पर दिखाई जा रही कीमतें सही हों और रेस्टोरेंट की ओर से दी जाने वाली सेवाओं से मेल खाती हों। आयोग ने स्विगी के उस तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें कंपनी ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत खुद को मध्यस्थ बताते हुए जिम्मेदारी से छूट का दावा किया था। आयोग ने कहा कि धारा 79 के तहत कुछ परिस्थितियों में मध्यस्थों को जिम्मेदारी से छूट मिल सकती है, लेकिन यह सुरक्षा इस शर्त के अधीन है कि प्लेटफॉर्म की ओर से उचित सावधानी बरती गई हो।

प्लेटफॉर्म पर दिखाई कीमत से 40 से 47 फीसदी ज्यादा वसूले

उपभोक्ता आयोग ने पाया कि रेस्टोरेंट में वसूली गई वास्तविक कीमत स्विगी डाइनआउट पर दिखाई गई रकम से करीब 40 से 47 फीसदी ज्यादा थी। सुनवाई के दौरान स्विगी ने दलील दी कि 1,500 रुपये की रकम केवल औसत या अनुमानित कीमत थी और ग्राहक बुकिंग से पहले विस्तृत मेन्यू और वास्तविक कीमत देख सकता था। हालांकि, आयोग ने कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि डाइनआउट लिस्टिंग में कहीं भी यह संकेत नहीं दिया गया था कि 1,500 रुपये की रकम सिर्फ अनुमानित है। स्विगी की अपनी शर्तों में भी ऐसा कोई डिस्क्लेमर नहीं था, जिसमें इस रकम को अनुमानित या गैर-बाध्यकारी बताया गया हो।

बताई कीमत और वास्तविक बिल में था बड़ा अंतर

आयोग ने कहा कि प्री-बुकिंग के समय ग्राहक को बताई गई कीमत से यह उम्मीद बनती है कि वास्तविक बिल उससे बहुत अलग नहीं होगा। लेकिन इस मामले में ऑनलाइन दिखाई गई कीमत और रेस्टोरेंट में वसूली गई रकम के बीच अंतर मामूली नहीं, बल्कि काफी अधिक था। फैसले में आयोग ने स्विगी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना। आयोग के मुताबिक, बुकिंग के समय प्लेटफॉर्म के पास रेस्टोरेंट के वीकेंड बुफे की सही और आइटम-वाइज कीमतों की जानकारी मौजूद थी। ऐसे में ग्राहक को प्लेटफॉर्म पर गलत कीमत दिखाया जाना केवल तकनीकी या मामूली गलती नहीं माना जा सकता।

बिना किसी डिस्क्लेमर के दिखाई गई थी कीमत

आयोग ने कहा कि दो लोगों के बुफे के लिए कम कीमत वाला आंकड़ा प्लेटफॉर्म पर बिना किसी स्पष्ट डिस्क्लेमर के दिखाया जाता रहा, जबकि वीकेंड के लिए वास्तविक कीमतें अलग थीं। ऐसे में ग्राहक के लिए ऑनलाइन दिखाई गई कीमत को बुकिंग के समय उपलब्ध वास्तविक कीमत मानना स्वाभाविक था। आयोग ने रेस्टोरेंट और स्विगी दोनों की भूमिका को जिम्मेदारी के दायरे में रखा। फैसले के मुताबिक, विज्ञापन देने वाले सर्विस प्रोवाइडर के तौर पर रेस्टोरेंट जिम्मेदार था। वहीं, स्विगी भी उस प्लेटफॉर्म के तौर पर जिम्मेदार था, जहां ग्राहक को गुमराह करने वाली कीमत प्रदर्शित की गई।

स्विगी नियमों का पालन करने में असफल रहा

आयोग ने अपने फैसले में कंज्यूमर प्रोटेक्शन (ई-कॉमर्स) रूल्स, 2020 का भी हवाला दिया। इन नियमों के तहत ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि विक्रेता की ओर से प्रदर्शित जानकारी सही हो और वास्तव में दी जा रही वस्तु या सेवा से मेल खाती हो। आयोग ने कहा कि स्विगी ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि प्लेटफॉर्म पर ‘दो लोगों के लिए कीमत’ के तौर पर दिखाई गई रकम और रेस्टोरेंट की वास्तविक बिलिंग के बीच मिलान करने की कोई व्यवस्था थी। आयोग के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था का अभाव प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को और महत्वपूर्ण बनाता है।

मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए मिलेंगे 1 लाख रुपये

सुनवाई के बाद उपभोक्ता आयोग ने स्विगी और संबंधित रेस्टोरेंट को शिकायतकर्ता को संयुक्त रूप से 1 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। यह रकम मानसिक परेशानी, उत्पीड़न, असुविधा और कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च के लिए दी जाएगी। आयोग ने दोनों पक्षों को यह रकम चार सप्ताह के भीतर चुकाने का आदेश दिया है। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किए जाने पर पूरी राशि पर 12 फीसदी सालाना की दर से ब्याज देना होगा।

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