बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐसे फैसले को पलट दिया है। इस फैसले में सिर्फ व्हाट्सएप चैट्स के आधार पर पति को उसकी पत्नी से क्रूरता का हवाला देकर तलाक मिल गया था। कोर्ट ने साफ कहा कि महज मैसेज दिखाकर तलाक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि ठोस सबूत पेश न किए जाएं और दूसरी पार्टी को अपना पक्ष रखने का मौका न मिले। यह फैसला 27 फरवरी को जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे की बेंच ने दिया। कोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के मई 2025 के आदेश को पूरी तरह रद कर दिया और मामले को वापस उसी कोर्ट में भेज दिया है, जहां अब दोनों पक्षों को सबूत पेश करने और बहस करने का पूरा मौका मिलेगा।
यह मामला हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक से जुड़ा है। पति ने दावा किया था कि पत्नी ने उसे और उसके परिवार को मानसिक रूप से परेशान किया। फैमिली कोर्ट ने पति की बात को सही माना और तलाक दे दिया, लेकिन हाई कोर्ट ने इसे गलत ठहराया।
फैमिली कोर्ट ने सिर्फ चैट्स पर भरोसा किया
नासिक फैमिली कोर्ट ने पति की गवाही को व्हाट्सएप और एसएमएस चैट्स से समर्थन मिलने की बात कही थी। कोर्ट के मुताबिक, पत्नी बार-बार नासिक छोड़कर पुणे शिफ्ट होने की जिद कर रही थी, जहां वह ससुराल वालों को छोड़ना चाहती थी। चैट्स में सास और ननद के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक बातें भी थीं। पत्नी ने पति के इनकार पर दबाव बनाने, इमोशनल ब्लैकमेल करने और गुस्से में कड़वी-कड़वी भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगा था।
फैमिली कोर्ट ने कहा था कि पत्नी ऐसी हरकतें नहीं कर सकती, इसलिए पति को उसके साथ रहना जरूरी नहीं है। इस आधार पर तलाक मंजूर कर दिया गया। कोर्ट ने पति की गवाही को ‘अनचैलेंज्ड’ यानी बिना विरोध के माना, क्योंकि मामला एक्स-पार्टे (एक तरफा) चला था। पत्नी को सुनवाई का मौका नहीं मिला था।
हाई कोर्ट ने कहा- चैट्स अकेले काफी नहीं
हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश की जांच की और पाया कि सिर्फ चैट्स पर भरोसा करके तलाक नहीं दिया जा सकता। जजों ने कहा, “महज व्हाट्सएप चैट्स पर निर्भर रहकर तलाक का फैसला नहीं हो सकता, क्योंकि इसे ठीक से सबूत के तौर पर पेश नहीं किया गया।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी को इन चैट्स का जवाब देने या उन्हें चुनौती देने का कोई मौका नहीं दिया गया।
जस्टिस डांगरे और देशपांडे ने कहा कि क्रूरता साबित करने के लिए सही तरीके से सबूत पेश करना जरूरी है। बिना दूसरी पार्टी को सुने और बिना क्रॉस-एग्जामिनेशन के ऐसे संवेदनशील फैसले नहीं हो सकते। इसलिए उन्होंने फैमिली कोर्ट के तलाक के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया।
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