FPI Selling Latest Update : भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने चिंताएँ बढ़ा दी हैं. मार्च महीने में अब तक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने लगभग $11 बिलियन (लगभग 1 लाख करोड़) के भारतीय शेयर बेचे हैं.

इसे उनके द्वारा अब तक की सबसे बड़ी एक महीने की बिकवाली माना जा रहा है. बिकवाली का यह दौर ऐसे समय में आया है जब Nifty-50 का वैल्यूएशन प्रीमियम कम हो गया है, जिससे यह वैश्विक बाजार के स्तरों के करीब आ गया है; फिर भी, इसके बावजूद, विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर बना हुआ है.
रिकॉर्ड-स्तर की बिकवाली
Bloomberg के डेटा के अनुसार, मार्च 2026 में अब तक का सबसे बड़ा FPI आउटफ्लो देखा गया है. इससे पहले, अक्टूबर 2024 में, इन विदेशी निवेशकों ने लगभग $10.9 बिलियन के शेयर बेचे थे. इसके अलावा, जनवरी 2025 में और COVID-19 काल के दौरान मार्च 2020 में भी काफ़ी आउटफ्लो कुल लगभग $8.4 बिलियन दर्ज किया गया था. हालांकि, इस बार दर्ज किए गए आँकड़े उन सभी पिछले मामलों से कहीं ज्यादा हैं.
विदेशी निवेशक बाजार से बाहर क्यों निकल रहे हैं?
विशेषज्ञ विदेशी निवेशकों के इस पलायन के पीछे कई मुख्य कारण बताते हैं. इसका मुख्य कारण US बॉन्ड यील्ड में हुई बढ़ोतरी है. मार्च की शुरुआत से अब तक US ट्रेजरी यील्ड 50 बेसिस पॉइंट बढ़कर लगभग 4.4% तक पहुँच गई है, जिससे जोखिम-मुक्त निवेश अपेक्षाकृत ज़्यादा आकर्षक हो गए हैं.
इसके साथ ही, भारतीय रुपया भी कमज़ोर हुआ है, जिसका विदेशी निवेशकों को मिलने वाले रिटर्न पर नकारात्मक असर पड़ा है. रुपये के मूल्य में गिरावट का मतलब है निवेशकों के लिए डॉलर के रूप में मिलने वाले रिटर्न में कमी, जिससे वे अपनी पूंजी समय से पहले ही निकालने को प्राथमिकता दे रहे हैं.
रुपये की कमजोरी से दबाव और बढ़ा
मार्च महीने के दौरान रुपया लगभग 4% कमजोर हुआ और 27 मार्च को US डॉलर के मुकाबले 94.78 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गया. कमजोर मुद्रा विदेशी निवेशकों के लिए दोहरी मार साबित होती है: एक तरफ तो शेयर बाजार में गिरावट आती है. दूसरी तरफ मुद्रा विनिमय में होने वाले प्रतिकूल बदलावों के कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है.
कच्चे तेल की कीमतें अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार $100 प्रति बैरल के स्तर से ऊपर बनी हुई हैं. भारत जैसे तेल आयात करने वाले देश के लिए, यह स्थिति नकारात्मक मानी जाती है, क्योंकि इससे महंगाई बढ़ती है, चालू खाता घाटा (current account deficit) बढ़ता है. कॉर्पोरेट कमाई पर दबाव पड़ता है.
कमाई के अनुमानों में कटौती
बाजार विश्लेषकों ने अब वित्त वर्ष 2026 के लिए निफ्टी कंपनियों की कमाई के अनुमानों में 2–3% की कटौती करना शुरू कर दिया है. UBS के ग्लोबल स्ट्रेटेजिस्ट भानु बावेजा के अनुसार, “भारत में FPI का प्रवाह (inflows) फिलहाल धीमा रहने की संभावना है. रुपया भी कमजोर स्थिति में ही ट्रेड करता रह सकता है. इसका मतलब है कि निकट भविष्य में विदेशी निवेश में फिर से तेजी आने की कोई संभावना नहीं दिख रही है.
भारतीय बाजार में FPI की हिस्सेदारी
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के अनुसार 15 मार्च तक विदेशी निवेशकों के पास भारतीय इक्विटी बाजार में लगभग $710 बिलियन का निवेश था, जो कुल बाजार पूंजीकरण (market capitalization) का लगभग 15% है.
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