रायपुर. छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा किसी एक किताब, एक कवि या एक कालखंड की देन नहीं है। यह परंपरा स्मृति से जन्म लेती है, लोक से चलकर शास्त्र तक जाती है और शास्त्र से लौटकर फिर लोक में घुल जाती है। यह वही भूमि है जिसे प्राचीन ग्रंथों में दक्षिण कोसल कहा गया। रामायण, महाभारत और पुराणों में इसके उल्लेख मिलते हैं। वाल्मीकि के रामायण में उल्लेखित दंडकारण्य केवल वन नहीं है, वह कथा, संस्कृति और चेतना का विस्तार है और उसी विस्तार में आज का छत्तीसगढ़ सांस लेता है।

कालिदास के साहित्य में कोसल की समृद्धि का वर्णन आता है। यह संकेत है कि यह क्षेत्र कभी साहित्यिक चेतना के हाशिए पर नहीं रहा, यहां जीवन था, विचार था, और शब्दों की प्रतिष्ठा थी।

सिरपुर के बौद्ध विहार, अभिलेख और स्तूप इस बात की ठोस ऐतिहासिक पुष्टि करते हैं कि छत्तीसगढ़ ज्ञान, विमर्श और अध्ययन की भूमि रहा है। लेकिन छत्तीसगढ़ की असली साहित्यिक शक्ति किसी ग्रंथागार में नहीं, उस लोक में है जो गाता है। ददरिया, पंथी, सुवा गीत, भरथरी, चंदैनी, लोरिक-चंदा, ये केवल गीत या नृत्य नहीं, ये समाज की चलती हुई स्मृतियां हैं।

लोरिक-चंदा जैसी गाथाएं प्रेम, संघर्ष और नैतिकता को पीढ़ियों के कंठ में सुरक्षित रखती हैं। छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य की एक बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्त्री बोलती है, श्रम गाता है और समाज अकेला नहीं, सामूहिक होता है।

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन यहां लोकधर्म बनकर आया। कबीर की वाणी, रामनाम की साधना, सतनाम की गूंज, और रामनामी समाज। जहां राम नाम शरीर पर अंकित होता है और इस तरह तन-मन साहित्य हो जाता है।

यह साहित्य और सामाजिक साहस का अनूठा उदाहरण है।यह वह साहित्य है, जो लिखा कम गया, जिया ज्यादा गया।

आधुनिक काल में छत्तीसगढ़ी भाषा ने अपनी साहित्यिक पहचान बनाई। पंडित सुंदरलाल शर्मा ने भाषा, इतिहास और संस्कृति को वैचारिक आधार दिया और छत्तीसगढ़ को केवल भूगोल नहीं, संस्कृति के रूप में पढ़ने की दृष्टि दी। गजानन माधव मुक्तिबोध का समय हिंदी कविता की सबसे बेचैन चेतना को गढ़ता है। यहां की सामाजिक भूमि ने उनकी कविता को आत्मसंघर्ष और नैतिक प्रश्न दिए।

इसके बाद विनोद कुमार शुक्ल की शांत, पारदर्शी भाषा, हबीब तनवीर का रंगमंच, लाला जगदलपुरी का बस्तर केंद्रित लेखन, हरिहर वैष्णव की भाषाई साधना, इन सबने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय साहित्य में एक गहरी, मानवीय पहचान दी।

आज छत्तीसगढ़ का साहित्य हिंदी, छत्तीसगढ़ी, हल्बी, गोंडी, सरगुजिया, कुड़ुख, कई भाषाओं में बोलता है,‌ छत्तीसगढ़ का साहित्य इतिहास रचने से अधिक स्मृति बचाने का काम करता है। और शायद इसी कारण है कि यह साहित्य आज भी जीवित है, संवेदनशील है, और भरोसेमंद है।