कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। ग्वालियर के महाराज बाड़े पर केंद्रीय मंत्री और सिंधिया राजवंश के महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज मंसूर शाह की देवघर में पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। यह पूजा सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं,बल्कि सिंधिया राजवंश के 300 साल पुराने इतिहास से जुड़ी एक ऐसी कहानी भी है।जिसमें युद्ध, एक सूफी संत का आशीर्वाद और आधी रोटी का खास महत्व है,महादजी सिंधिया के समय से चली आ रही इस परंपरा को आज भी राजपरिवार का मुखिया निभाता है। आखिर क्या है मंसूर शाह और सिंधिया राजवंश के बीच आस्था के इस रिश्ते की कहानी?
महादजी सिंधिया के समय से चली आ रहीपरंपरा
ग्वालियर के ऐतिहासिक महाराज बाड़े के गोरखी परिसर में स्थित देवघर में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जो सिंधिया राजपरिवार के महाराज भी है,उन्होंने मंसूर शाह की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने कहा कि मंसूर शाह जी की पूजा कर उन्होंने आशीर्वाद लिया है। सिंधिया राजवंश में महादजी सिंधिया के समय से चली आ रही इस परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है। देवघर में मंसूर शाह की स्मृति से जुड़ी वस्तुएं भी सुरक्षित रखी गई हैं।
सिंधिया राजपरिवार की इस परंपरा के पीछे एक दिलचस्प कहानी प्रचलित है। बताया जाता है कि सिंधिया राजवंश के संस्थापक महादजी सिंधिया जब पानीपत के युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, तब उनके परिवार को उनकी सलामती की चिंता सता रही थी। इसी दौरान महादजी की मां और पत्नी सूफी संत मंसूर शाह के पास पहुंचीं। मान्यता के मुताबिक, संत ने उन्हें महादजी के जीवित होने और वापस लौटने का भरोसा दिलाया। कुछ समय बाद घायल महादजी के जीवित लौटने पर परिवार ने इसे संत के आशीर्वाद से जोड़कर देखा,कहानी के मुताबिक, इसके बाद मंसूर शाह ने महादजी को आधी रोटी दी और उन्हें पांच पीढ़ियों तक राज करने का आशीर्वाद दिया। इस आधी रोटी को सिंधिया परिवार ने एक अनमोल धरोहर के रूप में आज भी संभालकर रखा है। देवघर में आज भी इस रोटी के अवशेष और संत से जुड़ी दूसरी वस्तुओं की पूजा की जाती है।
देवघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ सूफी संत मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियां
मंसूर शाह और सिंधिया राजपरिवार के बीच यह संबंध सिर्फ एक कहानी तक सीमित नहीं है। ग्वालियर के गोरखी परिसर में बने देवघर में हिंदू देवी-देवताओं के साथ सूफी संत मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियां भी रखी गई हैं। परंपरा के अनुसार,राजपरिवार का मुखिया विशेष अवसरों पर यहां पहुंचकर पूजा करता है। श्राद्ध पक्ष के दौरान होने वाली इस पूजा में फूलों से सजे शिवलिंग के प्रतीकात्मक स्वरूप पर सिंधिया राजपरिवार की शाही पगड़ी को रखा जाता है और नीचे चादर बिछाई जाती है,मान्यता है कि जब फूल चादर पर गिरता है,तभी पूजा संपन्न होती है।इसके लिए कई बार मुखिया को घण्टो इंतजार करना पड़ता है।
आधी रोटी और आशीर्वाद का रहस्य
महादजी सिंधिया के दौर से चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्वालियर की ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। आधी रोटी और आशीर्वाद की कहानी के साथ जुड़ी यह पूजा सिंधिया राजवंश और सूफी संत मंसूर शाह के बीच पीढ़ियों से चले आ रहे रिश्ते की याद दिलाती है। जो हिन्दू मुस्लिम एकता का भी परिचायक बनी है।
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