कर्ण मिश्रा, ग्वालियर। ग्वालियर में बीते दिनों एजी ऑफिस के पास अवैध रूप से संचालित दारुल कुरआन मदरसे पर मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष ने कार्रवाई कर 26 बच्चों को रेस्क्यू किया था। वहीं अब इस मदरसे के निर्माण, अनुमति, जमीन के मालिकाना हक को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। AG ऑफिस की चारदीवारी के भीतर मस्जिद और मदरसे के करीब 4 से 4500 वर्गफीट में हुए निर्माण को लेकर सरकारी जमीन के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। सवाल है कि जब जमीन राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय दर्ज है, तो खसरे के कॉलम नंबर 12 में ‘मस्जिद नजूल’ की एंट्री किसने और कब की? निर्माण की अनुमति किसने दी और जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे बनने से क्यों नहीं रोका? प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है।

सरकारी जमीन पर कैसे हुए मदरसे का निर्माण?

दरअसल, AG ऑफिस के पास चारदीवारी के भीतर मस्जिद और मदरसे का निर्माण सामने आने के बाद जमीन के स्वामित्व और निर्माण की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। बच्चों के लगाए गए कथित प्रताड़ना के आरोप, मदरसे में हिन्दू, ईसाई, यहूदियों के खिलाफ किताबों में भड़काऊ शिक्षा सामग्री के बाद जांच तेज हुई। इसी कड़ी में निर्माण, विस्तार, जमीन मालिकाना हक को लेकर दिल्ली और भोपाल की टीमें भी इस मामले की जांच में जुट गई, लेकिन संबंधित रिकॉर्ड नहीं मिलने के कारण स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन सरकारी बताई जा रही है, तो उस पर धार्मिक स्थल और मदरसे का निर्माण कैसे हुआ?

पुराने इतिहास को लेकर भी उठे सवाल

करीब 4 से 4500 वर्गफीट क्षेत्र में बने इस निर्माण के लिए किस विभाग ने अनुमति दी? क्या निर्माण के दौरान जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने अनदेखी की या फिर जमीन के रिकॉर्ड में बाद में बदलाव हुआ? इन तमाम पहलुओं की पड़ताल की जा रही है। इस मामले में निर्माण के पुराने इतिहास को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी सामने आई है कि 1973 से 1977 के बीच तत्कालीन महालेखाकार एस. मंजूर-ए-मुस्तफा ने नमाज के लिए अवैध रूप से 200 वर्गफीट जगह दी थी। जिसका धीरे धीरे दायरा बढ़ता गया। हालांकि इस जानकारी की जांच टीम पुष्टि करने में जुटी है।

SDM ने कही ये बात

वहीं एसडीएम अतुल सिंह के मुताबिक, मस्जिद के लिए जमीन आवंटित को लेकर राजस्व विभाग से रिकॉर्ड मंगाकर जांच की जाएगी, उसके बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। अब प्रशासन की जांच में यह पता लगाना अहम होगा कि जमीन की मूल स्थिति क्या थी, ‘मस्जिद नजूल’ की प्रविष्टि कब दर्ज हुई और निर्माण के दौरान संबंधित विभागों ने क्या कार्रवाई की। फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकारी जमीन पर इतना बड़ा निर्माण किसकी अनुमति से हुआ? क्या यह पुराने समय में हुआ अतिक्रमण है या जमीन के रिकॉर्ड में किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई? जांच के बाद ही इन सवालों के जवाब सामने आएंगे और जिम्मेदारी तय हो सकेगी।

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