Haryana Air Pollution : हरियाणा। प्रदेश में बढ़ते वायु प्रदूषण ने लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। कई शहरों में हवा इतनी जहरीली हो गई है कि सांस लेना भी सेहत के लिए खतरा बन रहा है। शनिवार को सोनीपत और जींद में PM2.5 का स्तर निर्धारित सुरक्षित सीमा से आठ गुना से ज्यादा दर्ज किया गया। वहीं बल्लभगढ़ 409 AQI के साथ देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में पहले स्थान पर पहुंच गया। सिरसा दूसरे नंबर पर रहा।

सोनीपत और जींद में PM2.5 का स्तर 490 के पार

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, शनिवार सुबह सोनीपत के मुरथल में PM2.5 का स्तर 496 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर दर्ज किया गया। इसकी निर्धारित सुरक्षित सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है।

इसी तरह जींद में PM2.5 का स्तर 490, रोहतक में 463 और हिसार में 403 दर्ज किया गया। गुरुग्राम के सेक्टर-51 में यह आंकड़ा 361 और फरीदाबाद में 356 रहा। इन आंकड़ों से साफ है कि प्रदेश के कई शहरों में हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है।

बल्लभगढ़ देश का सबसे प्रदूषित शहर, सिरसा दूसरे नंबर पर

वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के मामले में भी हरियाणा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। शनिवार को देश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में हरियाणा के कई शहर शामिल रहे।

शहरAQI
बल्लभगढ़409
सिरसा383
गजरौला382
पंचगांव377
दिल्ली369
बहादुरगढ़364
खोड़ा352
बिलाईपाड़ा350
अनपरा345
गुरुग्राम345

बल्लभगढ़ 409 AQI के साथ पहले और सिरसा 383 AQI के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके अलावा पंचगांव और बहादुरगढ़ भी देश के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल रहे।

पंचकूला की हवा सबसे साफ, कई शहरों में हालात खराब

प्रदेश के सभी शहरों में प्रदूषण का असर एक जैसा नहीं है। पंचकूला में AQI 48 दर्ज किया गया, जो अच्छी श्रेणी में आता है। इसके मुकाबले अंबाला और कुरुक्षेत्र में AQI 241, करनाल में 254 और पानीपत में 279 रहा। इन शहरों में हवा खराब श्रेणी में दर्ज की गई।

पराली का धुआं और धीमी हवा बढ़ा रही प्रदूषण

विशेषज्ञों के मुताबिक, हरियाणा में प्रदूषण बढ़ने के पीछे पराली का धुआं, वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन और धूल प्रमुख कारण हैं। उपग्रह तस्वीरों के आधार पर सामने आया कि शनिवार सुबह से पहले के 24 घंटों में पंजाब में पराली जलाने के 357 नए मामले दर्ज किए गए।

उत्तर-पश्चिमी हवाओं के साथ पराली का धुआं हरियाणा के मैदानी इलाकों तक पहुंच रहा है। दूसरी ओर, हवा की रफ्तार भी काफी कम है। सतह पर हवा 2.4 से 4.1 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चल रही है। इससे प्रदूषक कण वातावरण में फैलने के बजाय निचली सतह पर जमा हो रहे हैं।

PM10 और PM2.5 में क्या है अंतर?

हवा में मौजूद बेहद छोटे ठोस कणों और तरल बूंदों को पार्टिकुलेट मैटर (PM) कहा जाता है। इनके आकार के आधार पर इन्हें PM10 और PM2.5 में बांटा जाता है।

PM10: इन कणों का आकार 10 माइक्रोमीटर या इससे कम होता है। धूल, मिट्टी और निर्माण कार्यों से निकलने वाले कण इसमें शामिल हैं। ये नाक और गले में परेशानी, एलर्जी, सूखी खांसी और आंखों में जलन पैदा कर सकते हैं।

PM2.5: इनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या इससे कम होता है। ये पराली जलाने, वाहनों के धुएं और दूसरे प्रदूषण स्रोतों से निकलते हैं। बेहद छोटे होने के कारण ये फेफड़ों के अंदर तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से अस्थमा, हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।

सांस और दिल के मरीजों के लिए ज्यादा खतरा

फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. रणदीप गुलेरिया ने प्रदूषण के बढ़ते स्तर पर चिंता जताई है। उनके मुताबिक, बल्लभगढ़ समेत कई इलाकों में प्रदूषण गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है।

इस तरह की जहरीली हवा पहले से दमा, सांस की पुरानी बीमारी और हृदय रोग से जूझ रहे लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक है। प्रदूषण के कारण मरीजों को अचानक सांस फूलने और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए लोगों को सुबह और शाम के समय बाहर व्यायाम करने से बचना चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों और सांस के मरीजों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है।

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